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कम आय वाले देशों में 52 अरब डॉलर प्रत्येक बच्चे को सामाजिक सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं : सत्यार्थी

By भाषा | Updated: September 29, 2021 11:54 IST

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(योषिता सिंह)

संयुक्त राष्ट्र, 29 सितंबर नोबल पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि 52 अरब डॉलर कम आय वाले देशों में प्रत्येक बच्चे और गर्भवती महिला को सामाजिक सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं और 2,000 से अधिक अरबपतियों वाली दुनिया में यह ‘‘कोई बड़ी धनराशि’’ नहीं है।

‘गरीबी उन्मूलन और सतत बहाली के लिए रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा’ पर मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र में एक उच्च स्तरीय कार्यक्रम में सत्यार्थी ने बाल मजदूरी और गरीबी खत्म करने के लिए एक साहसिक तथा सक्रिय नेतृत्व का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि 52 अरब डॉलर कम आय वाले देशों में प्रत्येक बच्चे और गर्भवती महिला को सामाजिक सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘यह कोई बड़ी धनराशि नहीं हे। यह महज दो दिनों का कोविड राहत उपाय है और साथ ही सामाजिक सुरक्षा निधि का 0.4 प्रतिशत है जो अमीर देशों में खर्च किया गया।’’

नोबल शांति पुरस्कार विजेता ने एक वर्चुअल कार्यक्रम में कहा, ‘‘हम बहुत गरीब नहीं हैं। मैं यह मानने से इनकार करता हूं कि दुनिया बहुत गरीब है जबकि इस दुनिया में 2,755 अरबपति रहते हैं। हमने तब प्रगति की जब हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे, हमने बच्चों की मदद की और बाल मजदूरी बंद की।’’ उन्होंने कहा कि आज दुनिया प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में पहले से कहीं अधिक संसाधनों से भरपूर है।

सत्यार्थी ने कहा कि कोविड-19 महामारी ने समाज में सभी अन्यायों और गैर बराबरी का पर्दाफाश किया और उसे बढ़ाया भी है तथा इससे सबसे ज्यादा प्रभावित वह बच्चे हुए जो हाशिये पर पड़े हैं, खासतौर से विकासशील, काम आय और मध्यम आय वाले देशों में।

उन्होंने कहा कि महामारी के कारण कई और बच्चों को गरीबी में धकेल दिया गया है। ये बच्चे स्कूल नहीं आ रहे, इन्हें स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं नहीं दी गयीं, स्वच्छ पेयजल या स्वच्छ हवा नहीं दी गयी। उन्होंने कहा, ‘‘ये वे बच्चे हैं जिन्हें जानवरों की तरह बेचा और खरीदा गया और कई बार जानवरों से भी कम कीमतों पर। ये वे बच्चे हैं जिनका बाल मजदूरों के तौर पर शोषण किया गया।’’

सत्यार्थी ने आगाह किया कि अगर देशों ने अपने बच्चों की रक्षा नहीं की तो ज्यादातर सतत विकास लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकेगा। उन्होंने चिंता जतायी कि महामारी से पहले 2016-2020 में करीब 10,000 बच्चों को हर दिन बाल मजदूरी में धकेला गया।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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