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मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे 'वर्षा' छोड़कर 'मातोश्री' गये, क्या महाराष्ट्र में पलट गई सत्ता?

By आशीष कुमार पाण्डेय | Published: June 23, 2022 11:10 AM2022-06-23T11:10:23+5:302022-06-23T11:13:46+5:30

महाराष्ट्र में अघोषित तौर पर हो चुका है सत्ता का सरेंडर, पहले सूरत और फिर गुवाहाटी में कैंप कर रहे एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बता दिया कि बस अब आप रहने दें। दरअसल गौर करने की बात यह है कि एकनाथ शिंदे एक बात बार-बार कह रहे हैं कि उन्होंने शिवसेना नहीं छोड़ी है, वो बाला साहेब ठाकरे के दिखाए हिंदुत्व के रास्ते पर चल रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उस हिंदुत्व के रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन के तौर पर उद्धव ठाकरे ही आकर खड़े हो गये हैं, जिन्हें साइड लाइन करने के लिए एकनाथ शिंदे को भाजपा से लॉजिस्टिक सपोर्ट लेनी पड़ी या इसके कुछ गंभीर मतलब हैं।

हम यह बात इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि महाराष्ट्र भाजपा प्रमुख चंद्रकांत पाटिल खुद बागी विधायकों को उनके असली ठिकाने यानी गुवाहाटी पहुंचाने में खुले तौर पर मदद कर रहे हैं।

अब अगर एकनाथ शिंदे शिवसेना नहीं छोड़ रहे हैं, तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि उद्धव ठाकरे को भी शिवसेना के अघोषित मार्गदर्शक मंडल की ओर ढकेला जा रहा है। शिवसेना में बगावत का पेंच इतना आसान है नहीं, जितना की बाहर से देखने पर लग रह है।

याद करिये तो साल 2012 से पहले तक का वो दौर, जब तक बाला साहेब ठाकरे जीवित थे, उनकी अपनी शैली थी और पूरे ठसक के साथ वो सत्ता को हांकने की कूबत रखते थे। सत्ता से बाहर रहते हुए भी वो उस पर पूरा कमांड रखते थे। उन्हीं की देन थी कि मनोहर जोशी लोकसभा के स्पीकर के पद तक पहुंचे थे।

दरअसल बाल ठाकरे जिस पैन हिंदुत्व की बात करते थे वो भाजपा को भी रास आती थी। उस समय भाजपा की कमान वाजपेयी और आडवाणी के हाथों में थी। उस समय बाल ठाकरे अकेले ऐसे छत्रप थे, जो खुले तौर पर कहा करते थे कि बाबरी ढांचे को शिवसैनिकों ने गिराई, जिसे जो करना है कर ले। 

चूंकि जिस आक्रामक तेवर से बाला साहेब ठाकरे हिंदुत्व की वकालत करते थे, वो उस दौर में भाजपा के उभार के लिए खाद-पानी का काम कर रही थी। नवंबर 2012 में बाला साहेब ठाकरे का निधन होता है और कमान सीधे तौर पर उद्धव ठाकरे के पास चली आती है। लेकिन उद्धव ठाकरे अपने सॉफ्ट छवि के कारण उस पैने हिंदुत्व से धीरे-धीरे दूर होते गये, जिसे बाला साहेब ने डंके की चोट पर बुलंद किया था।

वहीं दूसरी ओर साल 2014 में जैसे ही सत्ता नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हाथों में आयी, सत्ता का निजाम बदला, तेवर बदले और भाजपा की राजनीति वाजपेयी और आडवाणी से हटकर अलग किस्म की हो गई।

महाराष्ट्र में भी भाजपा ने हावी होने की कोशिश की, जो उसने बाला साहेब के रहते हुए कभी नहीं की थी। उद्धव ठाकरे को लगा कि ऐसा न हो कि जिस हिंदुत्व के एजेंडे पर शिवसेना की नींव टिकी है, उस पर भाजपा कहीं अपना मजबूत किला न खड़ा कर ले।

भाजपा को काउंटर करने के लिए उद्धव ठाकरे ने पिता बाल ठाकरे की नीतियों को थोड़ा सा डाल्यूट किया, जिसका खामयाजा वो आज भुगत रहे हैं। उन्होंने बाल ठाकरे के बरक्स माने जाने वाले महाराष्ट्र की दूसरी शख्सियत शरद पवार की बातों में आकर कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया और भाजपा को सत्ता से दूर ढकेल दिया। लेकिन वो भूल गये कि न तो वो बाल ठाकरे हैं और न ही भाजपा की कमान अब अटल-आडवाणी के पास है।

भाजपा ने 'ऑपरेशन लोटस' के जरिये कर्नाटक में सरकार बनाई, मध्य प्रदेश में बनाई, राजस्थान में भी कोशिश की लेकिन वहां कुछ हुआ नहीं। लेकिन भाजपा के लिए महाराष्ट्र में आसानी इसलिए हुई क्योंकि उद्धव ठाकरे ने बाल ठाकरे की विचारधारा को डायल्यूट कर दिया।

यही कारण है कि एकनाथ शिंदे ने मुंबई छोड़ा तो उन्होंने उद्धव ठाकरे को भी वर्षा छोड़ने पर मजबूर कर दिया। याद करिये बाल ठाकरे का दौर, याद करिये शिवसेना के वो तेवर, जब बाल ठाकरे के एक इशारे पर मुंबई ही नहीं पूरा महाराष्ट्र ठहर जाता था।

लेकिन कल रात जब उद्धव ठाकरे वर्षा से निकले और मातोश्री गये तो क्या हुआ। महज चंद कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटी तो क्या ये मान लिया जाए कि वाकई उद्धव ठाकरे अपने पिता की विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाये और क्या उसी का का नतीजा है 'वर्षा' से 'मातोश्री' की वापसी।

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