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मांसाहार से दूर हो रहे हैं इन मुस्लिम बहुल देशों के युवा,जानिए कारण

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: July 26, 2022 16:51 IST

एक रिपोर्ट के मुताबिक नाइजीरिया में रहने वाले युवा अब शाकाहारी भोजन को अपने मुख्य भोजन के तौर पर शुरू करने का विचार बना रहे हैं। एक आंकलन की मानें तो 2050 तक दुनिया की आबादी का चौथा हिस्सा अफ्रीका में बस जाएगा। अगर वाकई एसा होता है तो अब मांसाहारी खाने पर निर्भर अफ्रीका के लिए शाकाहारी भोजन को अपनाना एक बेहतर विकल्प हो सकता है।

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ठळक मुद्देनाइजीरिया में रहने वाले युवा अब शाकाहारी भोजन को अपने मुख्य भोजन के तौर पर शुरू करने का विचार बना रहे हैं।बीफ़ और भेड़ के मांस को वातावरण के लिए सबसे हानिकारक पाया गया।रिपोर्ट के अनुसार केन्या में 72 प्रतिशत युवाओं को शाकाहारी मांस पंसद आ रहा है।

खाने को लेकर हर शख्स की अलग पसंद होती है किसी को शाकाहारी पंसद है तो कोई मांसाहारी खाता है। कुछ लोग दोनों तरह के खाने को पंसद करते हैं। हालांकि मांसाहारी और शाकाहारी में से कौन सा खाना बेहतर है इस पर हमेशा विवाद रहता है। दुनिया में मांसाहारी भोजन को लेकर बढ़ रहे क्रेज के बीच अब एक अलग रिपोर्ट सामने आई है जो ये बताती है कि मुस्लिम बहुल देशों के युवा आने वाले वक्त में शाकाहारी मांस (Plant Meat) को ज्यादा पंसद कर सकते हैं। चौंका देने वाली इस रिपोर्ट के पीछे क्या कारण और फायदे हो सकते हैं आईए जानते हैं।

मुस्लिम बहुल देशों में शाकाहारी खाना बन रहा पसंद

पश्चिम अफ्रीका में नाइजीरिया सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। एक रिपोर्ट के मुताबिक नाइजीरिया में रहने वाले युवा अब शाकाहारी भोजन को अपने मुख्य भोजन के तौर पर शुरू करने का विचार बना रहे हैं। एक आंकलन की मानें तो 2050 तक दुनिया की आबादी का चौथा हिस्सा अफ्रीका में बस जाएगा। अगर वाकई एसा होता है तो अब मांसाहारी खाने पर निर्भर अफ्रीका के लिए शाकाहारी भोजन को अपनाना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। ये हैरान करने वाला जरूर है कि मुस्लिम आबादी वाला कोई भी देश या शहर क्या वाकई शाकाहारी भोजन को मुख्य भोजन के तौर पर अपना सकता है। बहरहाल ये कोई पहला मामला नहीं होगा इससे पहले भी कई मुस्लिम बहुल देशों के युवा मांसाहार से दूरी बना रहे हैं।  

फ्रेंच इंस्टिट्यूट फॉर डेमोग्राफिक स्टडी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक नाइजीरिया दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। यहां 40 करोड़ से भी ज्यादा लोग बस जाऐंगे। जबकि इथियोपिया 20करोड़ की जनसंख्या के साथ 8वें स्थान पर होगा। इजिप्ट 11वें पर और तंजानिया  15वें स्थान पर होगा। अब सवाल ये है कि जब इतनी आबादी अफ्रीकी देशों में बस जाएगी तो अब तक मांसाहारी भोजन पर निर्भर रहने वाले ये देश कैसे इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए भोजन की व्यवस्था करेंगे। हालांकि कुछ संस्थाओं ने इसका जवाब खोज निकाला है। शाकाहारी भोजन पर निर्भरता बढ़ाने से इन देशों को इतनी बड़ी आबादी के लिए भोजन की व्यवस्था करना में चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा। खास बात ये है कि अभी से अफ्रीकी देशों के युवाओं ने अपने भोजन में बदलाव करना शुरू कर दिया है। युवाओं की पंसद अब दालों और प्लांट बेस्ड डाइट की तरफ बढ़ रही है। जो उनकी सेहत के लिए भी अच्छी है। 

रिपोर्ट के अनुसार केन्या में 72 प्रतिशत युवाओं को शाकाहारी मांस पंसद आ रहा है। वहीं ये आंकड़ा नाइजीरिया में 63 प्रतिशत है जबकि इजिप्ट में 46 प्रतिशत है। इसमें नाइजीरिया के आंकड़े पर गौर करें तो पता लगता है कि वर्तमान में सबसे ज्यादा मांसाहारी खाने पर निर्भर करने वाले देश के युवा अब आने वाले वक्त में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। पश्चिम अफ्रीका में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने के बावजूद भी यहां के युवाओं की पंसद शाकाहारी मांस बन रहा है।

युवा मांसाहार से क्यों  बना रहे दूरी ?

नाइजीरिया ही नहीं बल्कि कई मुस्लिम बहुल देशों के युवा मांसाहार से दूरी बना रहे है। अफ्रिका के आंकड़े अपने आप में ये बताने के लिए काफी हैं पर इस पर कोई पुख्ता जानकारी सामने नहीं आ पाई है कि कितने मुस्लिम बहुल देश अब तक शाकाहारी बन चुके है या बन रहे हैं। बता दें कि पशु-अधिकार संगठन पेटा ने 2009 में एक वेबसाईट बना कर मुस्लिम लोगों को जोड़ना शुरू किया था । 2009 से अब तक लगातार मुस्लिक लोग न सिर्फ जानवरों के अधिकारों को बचाने के लिए आगे आए है बल्कि उन्होंने मांसाहार खाने को भी छोड़ दिया है। 

कुछ रिपोर्टस के मुताबिक दुनिया भर में 22 प्रतिशत लोग शाकाहारी है जबकि मांसाहारी जनसंख्या का आंकड़ 80 से 85 प्रतिशत के बीच है। हालांकि वक्त के साथ दोनों ही आंकड़ों में बदलाव हो रहा है। खैर शाकाहारी मांस (Plant Meat) और शाकाहारी खाने के फायदे और माँसाहार का बढ़ रहा विरोध इस पर भी प्रकाश डालते हैं। 

शाकाहारी खाने के फायदे 

कई स्टडीज में ये बात साबित हो चुकी है कि शाकाहारी खाने में खूब सारा फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट होता है। इनमें पोटेशियम,मैग्नीशियम, फोलेट, आयरन और विटामिन और जैसे सभी जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। कहा जाता है कि अगर आप नेचुरल तरीके से शरीर में ये सभी पोषक तत्व बनाए रखना चाहते हैं तो डाइट में प्लांट और फोर्टिफाइड फूड शामिल करें। इसी के साथ स्टडीज के मुताबिक नॉनवेज खाने वालों की तुलना में वेज खाने वालों का बॉडी मास इंडेक्स कम होता है, जिससे आपका वजन ठीक रहता है। गौतलब है कि बढ़ता वजन आज कल बिमारियों की मुख्य वजह है। 

शाकाहारी होने का सबसे ज्यादा फायदा डायबिटीज के मरीजों को मिलता है। शाकाहारी फूड ना सिर्फ ब्लड शुगर कम करता है बल्कि किडनी फंक्शन को भी सुधारता है।  जिन्हे ये बीमारी नहीं भी है और वो शाकाहारी तो उनमें आगे चलकर डायबिटीज की संभावना बहुत कम रहती है। एक रिसर्च के मुताबिक प्लांट प्रोटीन से किडनी की बीमारी होने का खतरा भी कम होता है। मांसाहारी खाना खाने वालों के लिए शाकाहारी खाने को मुख्य भोजन बनाना आसान नहीं। हालांकि इसका भी विकल्प है जिसे शाकाहारी मीट कहा जाता है। शाकाहारी मीट को स्वस्थ विकल्प माना जाता है। इस तरह के मांस को बनाने के लिए वनस्पति, प्रोटीन, गेहूं,  ग्लूटन या सीतान, सेम,  सोया और चावल जैसी सामग्री का सबसे ज़्यादा उपयोग किया जाता है। 

माँसाहार का बढ़ रहा विरोध

पशुओं के अधिकारों के लिए बने संगठन पेटा इंडिया की वेबसाईट के मुताबिक मांसाहारी खाना खाने से पर्यावरण को होने वाली क्षतियों से आने वाली पीढ़ियों को झूझने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। औद्योगिक दुनिया में भोजन के लिए पशुओं को पालना जल प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में से एक है पशुओं के मांस में पाए जाने वाले बैक्टीरिया कीटनाशक और एंटीबायोटिक्स उनके मल-मूत्र में भी पाए जाते हैं।  इन रसायनों का आसपास के बड़े क्षेत्रों के इकोसिस्टम पर भयावह प्रभाव पड़ सकता है और जल स्रोतों को दूषित करता है। जिस तर से दुनिया में मांसाहारी खाना खाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। वैसे ही दुनिया भर के देश मांस की आपूर्ति करने के लिए जमीन के बड़े-बड़े हिस्सों को फैक्ट्री फार्मों में बदल रहे हैं। इतना ही नहीं जंगलों की अंधाधुध कटाई से होने वाले मिट्टी के कटाव की वजह से उपजाऊ जमीनें बंजर में तब्दील हो रही हैं।

ग्लोबल वार्मिंग में मांसाहारी खाने का योगदान

वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक शोध की बात जाए तो वातावरण में होने वाले ग्रीनहाउस का चौथाई खाद्य उत्पादन से आता है और ग्लोबल वार्मिंग में इसका बड़ा योगदान होता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि अलग अलग तरह के खाद्य पदार्थ वातावरण में अलग तरह से प्रभाव डालते हैं। रिपोर्ट के अनुसार खाद्य पदार्थ से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब आधा हिस्सा केवल मांस या अन्य तरह के मांसाहारी खाद्य के कारण होता है। बीफ़ और भेड़ के मांस को वातावरण के लिए सबसे हानिकारक पाया गया।

भोजन शाकाहारी होना चाहिए या मांसाहारी इस बात पर हमेशा तर्क होते हैं। कुछ लोग मांसाहार को श्रेष्ठ समझते है और कुछ शाकाहार को पंसद करते हैं। इन दोनों पर चली आ रही बहस का शायद ही कोई अंत होगा। क्योंकि सवाल सिर्फ भूख का नहीं पर स्वाद का भी है। हालांकि आने वाले वक्त में जब दुनिया की आबादी इतनी बढ़ जाएगी कि हर किसी के लिए भोजन का इंतजाम करना चुनौती बन जाएगा तब शाकाहारी मांस (Plant Meat)  का विकल्प कई देशों को खाने के संकट से बचा सकता है। 

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