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Solar Eclipse, December 2019: सूर्य ग्रहण क्यों लगता है और क्या है राहु-केतु की कहानी, पढ़ें इससे जुड़ी पौराणिक कथा

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: December 26, 2019 12:05 IST

Solar Eclipse: हिंदू मान्यताओं में सूर्य और चंद्र ग्रहण का कारण राहु-केतु को बताया गया है। वहीं, विज्ञान के अनुसार जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है।

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ठळक मुद्देSolar Eclipse 2019: हिंदू मान्यताओं में सूर्य ग्रहण की राहु-केतु से जुड़ी है कहानीसमुद्र मंथन के बाद अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में विवाद के कारण राहु-केतु ने सूर्य को ग्रस लिया

Solar Eclipse, December 2019:सूर्य ग्रहण हो या चंद्र ग्रहण, दोनों की ही हिंदू धर्म में विशेष मान्यता है। मान्यताओं के अनुसार ग्रहण में सभी शुभ कार्य बंद कर देने चाहिए और इस दौरान पूजा-पाठ भी नहीं होते। सूर्य ग्रहण के 12 घंटे पहले ही सूतक शुरू हो जाता है और इसके बाद से ही शुभ कार्य बंद हो जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार ग्रहण के समय राहु और केतु नाम के असुर सूर्य को ग्रस लेते हैं और इसलिए ग्रहण लगता है। 

Solar Eclipse: सूर्य ग्रहण क्यों लगता है

विज्ञान के अनुसार जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है। ऐसी परिस्थिति में सूर्य का प्रकाश चंद्रमा के कारण ढक जाता है और पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाता है। जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य तीनों ही एक सीध में आ जाते हैं तो उसे ही पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं। 

वैसे सूर्य ग्रहण के पीछे की पौराणिक कहानी और भी दिलचस्प है। हिंदू मान्यताओं में सूर्य और चंद्र ग्रहण का कारण राहु-केतु को बताया गया है। इसके अनुसार समुद्र मंथन के बाद जब अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में विवाद हुआ तो भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप बना लिया। उन्होंने असुरों को अपने मोहजाल में फांसकर देवताओं से अलग बैठाया और एक-एक कर अमृतपान कराने लगीं। 

मोहिनी रूप में भगवान विष्णु देवताओं को तो अमृत का पान करा रहे थे लेकिन असुरों को उन्होंने अपनी माया से कोई और पदार्थ पिलाना शुरू कर दिया। स्वभार्नु नाम का असुर ये बात समझ गया और वह रूप बदलकर देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। मोहिनी अभी राहु को अमृत पिला ही रही थीं कि सूर्य और चंद्र देव ने उसे पहचान लिया। यह देख भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका धड़ अलग कर दिया।

स्वभार्नु उस समय तक गले तक अमृत पी चुका था जबकि कुछ बूंदे गले के नीचे भी पहुंच चूकी थी। इसलिए उसका सिर और घड़ का अलग-अलग हिस्सा अमर रह गया। इसी सिर वाले हिस्से को राहु कहते हैं जबकि धड़ वाले हिस्से को केतु कहा जाता है। चूकी सूर्य और चंद्र ने इस असुर को अमृत पीते हुए पहचान लिया था, इसलिए वह दोनों को अपना दुश्मन मानता है और ग्रहण के समय उन्हें ग्रस लेता है। मान्यताओं के अनुसार यही कारण है कि समय-समय पर सूर्य और चंद्र ग्रहण लगते हैं।

टॅग्स :सूर्य ग्रहणसूर्यहिंदू त्योहार
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