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UP: एससी/ एसटी एक्ट का झूठा मुकदमा लिखवाना पड़ा भारी, तीन साल की हुई सजा

By राजेंद्र कुमार | Updated: October 31, 2025 16:44 IST

मायावती सरकार में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग कर सैंकड़ों मुकदमे लिखाये गए थे. तब ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने का आदेश सरकार ने दिया था.

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग कर लोगों को झूठे मुकदमे में फंसाना भारी पड़ने लगा है. ऐसे ही एक मामले में लखनऊ के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने एससी एसटी एक्ट में झूठा मुकदमा लिखवाने वाली ममता को भारतीय दंड संहिता की धारा 182 के तहत छह माह और धारा 211 के तहत तीन साल की साधारण कारावास की सजा सुनाई है. दोनों ही सजा साथ-साथ चलेंगी. इस मामले में कोर्ट ने लखनऊ के जिलाधिकारी से कहा है कि अगर महिला को किसी प्रकार की राहत राशि दी गई हो तो उसे तत्काल वापस ले लिया जाए.वर्षों बाद इस तरह का फैसला लखनऊ कोर्ट ने सुनाया है.

मायावती सरकार में एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग कर सैंकड़ों मुकदमे लिखाये गए थे. तब ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने का आदेश सरकार ने दिया था.इसके बाद इस तरह के झूठे मुकदमे लिखवाने में अंकुश लगा था, लेकिन यह रुका नहीं था.अब कोर्ट ने इस मामले में सख्त फैसला सुनाया है.माना जा रहा है कि अब अपने विरोधी को फसाने के लिए लोग इस तरह का झूठा मुकदमा लिखाने की हिम्मत नहीं करेंगे.   

जांच से ऐसा हुआ झूठ का खुलासा 

जिस मामले में विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने ममता को सजा सुनाई है, वह 03 अप्रैल 2019 का है. यह मामला भारतीय किसान यूनियन की गुटबाजी के चलते शुरू हुआ. अभियोजन पक्ष के अनुसार लखनऊ के माल गांव निवासी ममता ने विपक्षी गुट के किसान नेता अर्जुन, विनोद कुमार व केशन के विरुद्ध तीन अप्रैल 2019 को थाना माल में लूट व एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज करवाया था.

विवेचना के दौरान यह पता चला कि ममता ने भारतीय किसान यूनियन के लोकतांत्रिक गुट के तहसील अध्यक्ष विष्णु पाल के कहने पर यह मुकदमा लिखवाया था. इससे पूर्व विष्णु पाल व अन्य के विरुद्ध विपक्षी गुट के किसान नेता अर्जुन सिंह गुट की महिला कार्यकर्ता आरती ने दहेज प्रथा, मारपीट व जान से मारने की धमकी देने का मुकदमा दर्ज करवाया था. इसी की रंजिश के चलते दोषी महिला ने पेशबंदी कर ये फर्जी मुकदमा दर्ज कराया.

इस जानकारी के आधार पर पुलिस में इस मामले में घटना से जुड़े स्वतंत्र गवाहो बयान लिए, इन लोगों ने यह बताया कि ममता ने झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है और रंजिशवश यह रिपोर्ट दर्ज कराई गई है.इस आधार पर मुकदमे के विवेचक क्षेत्राधिकारी माल शेषमणि पाठक ने मामले को समाप्त कर न्यायालय में अपनी रिपोर्ट भेज दी. साथ ही फर्जी मुकदमा दर्ज कराने की दोषी ममता के विरुद्ध परिवाद दर्ज कर कार्यवाही कराने का प्रार्थना पत्र दिया गया.इस मामले में न्यायालय के आदेश पर मुकदमा दर्ज कर कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई और विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने ममता को झूठा मुकदमा लिखवाने के लिए सजा सुनाई.

कोर्ट का फैसला 

न्यायाधीश त्रिपाठी ने ममता को सजा सुनाते हुए अपने फैसले में यह भी लिखा है कि विधायिका का उद्देश्य यह नहीं रहा कि झूठे मुकदमों में फंसाने वाले शरारती तत्वों को राहत राशि दी जाए.ऐसे मामलों में नियंत्रण लगाने की जरूरत है, जिसमे झूठे मुकदमे में फंसा कर सरकार राहत ली जाए। कोर्ट ने एससी एसटी अत्याचार निवारण नियमावली 1995 की व्याख्या करते हुए लखनऊ के जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि आगे भी किसी मामले में राहत की संपूर्ण राशि तब दी जाए,जब आरोप पत्र दाखिल हो जाए और मामला प्रथम दृष्टया सिद्ध हो. सिर्फ मुकदमा दर्ज होने भर में राहत राशि दस से पचास प्रतिशत न दी जाए. कोर्ट ने कहा कि मुकदमा दर्ज होने पर राहत राशि दिए जाने से मुकदमों की संख्या में वृद्धि हो जाएगी. 

टॅग्स :उत्तर प्रदेश समाचारSC/ST एक्टकोर्ट
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