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Hasdev Aranya: बात जल, जंगल, जमीन और जीवन की, और खेल कोयले का!

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: December 21, 2023 19:57 IST

एक दशक से भी लम्बा समय हो चूका जब आदिवासी हसदेव को बचने लड़ रहे, जहा की पूरी लड़ाई विकास के नाम पर कोयला खन्न को रोकने की है।

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ठळक मुद्देहसदेव में कटे चुके है अभी तक लाखों पेड़सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित फिर भी कट रहे रोजाना सैकड़ो पेड़ हसदेव के साथ ख़त्म हो जायेगा हजारों साल पुराना औषधि भंडार। छत्तीसगढ़ सहित पड़ोसी प्रदेशों को भी झेलना पड़ सकता है मानव हाथी द्वन्द

रायपुर। छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य के उझड़ने से ना सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि मध्यप्रदेश, ओडिसा, झारखण्ड तक होंगे अती प्रभावित।

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में फिर से एक बार गिरफ्तारियों, पेड़ कटाई और आंदोलन का दौर तेज हो चुका है। और एक बार फिर यहां रहने वाले हसदेव को बचाने मोर्चा निकल रहे हैं । जिसे लेकर पर्यावरण प्रेमी, समाज सेवी, और किसान नेता भी आपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। आखिर क्यों छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में लोगों ने सरकारों और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोला है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में स्थित हसदेव अरण्य प्रदेश के सबसे बड़े वनों में से एक है। जिसके क्षेत्रफल की बात करें तो लगभग 1700 वर्ग किलोमीटर का यह घना जंगल है। हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के साथ - साथ पड़ोसी प्रदेशों के लिए भी कई मायनों में बहुत इंपॉर्टेंट। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का हो कर भी झारखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश को सीधा प्रभावित करता है। इस पूरे क्षेत्र को मध्य भारत का सबसे बड़ा हाथी परिचालन क्षेत्र भी कहा जाता है।हसदेव अरण्य पिछले लगभग एक दशक से अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस घने जंगल के नीचे लगभग 24 कोयला खदानें भारत सरकार ने चिन्हित किए हैं। और इन कोयला खदानों के लिए वहां पर खुदाई की जानी है। जिसके चलते आदिवासियों को जो वहां के मूल निवासी हैं, वहां से निकलने वाली हसदेव नदी, पूरा सरगुजा संभाग, उसे घने जंगल में पाए जाने वाले कई तरह के जीव जंतु संरक्षित औषधि पौधे भी नष्ट हो जाएंगे। यहां रहने वाले आदिवासी लगातार अपने वन को बचाने लड़ाई लड़ रहे हैं इस लड़ाई में अब तक न जाने कितने ही लोगों को शासन प्रशासन द्वारा गिरफ्तार किया गया कितने ही लोगों ने इन घने जंगलों को बचाने चिपको आंदोलन के तर्ज पर खुद को पेड़ से चिपक कर कई कई दिनों तक रखा। पर सरकार कोई भी हो सभी इस जंगल  के संघर्ष करते इन आदिवासियो को अनसुना कर रहे। 

इस क्षेत्र में चल रहे खनन की प्रक्रिया को रोकने, यहां के लोगो द्वारा किए जा रहे आंदोलन को लेकर छत्तीसगढ़ विधानसभा में पिछले साल 26 जुलाई को विधायक द्वारा प्रस्ताव पारित कर केंद्र से पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में सभी कॉल खनन ब्लॉक के आवंटन को रद्द करने का आग्रह भी किया गया पर यहां यह बात बनती नहीं दिखी। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो चुका है और एक बार फिर से यहां पर खनन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जिसे लेकर आदिवासी ग्रामीण फिर एक बार मोर्चा खोल सरकार का विरोध कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाते हुए किसान नेता राकेश टिकैत ने भी सरकारों के खिलाफ आपनी नाराजगी जताई है।छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य की कटाई को लेकर न सिर्फ ग्रामीण आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं बल्कि शहरी क्षेत्र में भी लोगों में खासी जागरूकता देखी गई है और मौके पर हजारों की संख्या में लोगों ने पहुंचकर वनों की कटाई को रोका भी है। कुछ लोगों ने अपने पारिवारिक कार्यक्रमों के कार्डों पर भी से हसदेव की मुहिम चला रखी थी। बता दें की छत्तीसगढ़ विधानसभा ने दिनांक 26 जुलाई 2022 को अशासकीय संकल्प सर्वे सहमति से पारित किया था। जिसमें हसदेव अरण्य को खनन मुक्त रखा गया था। जानकारों की माने तो यह पूरा क्षेत्र पांचवी अनुसूची में आता है और किसी भी ग्राम सभा ने खनन की अनुमति नहीं दी है परसा ईस्ट केते बासेन कोयला खदान के दूसरे चरण के लिए खनन वन अधिकार कानून पेसा अधिनियम और भू अर्जन कानून तीनों का उल्लंघन किया जा रहा है। फिलहाल आदिवासियों, वहां के रह वासियों के द्वारा खनन की प्रक्रिया का घनघोर विरोध जारी है। अब देखने वाली बात यही होगी कि क्या यह विरोध के स्वर केंद्र तक पहुंचाते हैं क्या बदले हुए राज्य सरकार इसमें कोई संज्ञान लेती है ।   

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