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दिल्ली: नौकरी के लिए जज को घूस देने के मामले में एएसआई समेत तीन लोग दोषी करार

By विशाल कुमार | Updated: September 28, 2021 16:47 IST

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 2017 में हुई थी. दोषी दत्त तीस हजारी अदालत में 50 हजार रुपये का एक लिफाफा लेकर आया था और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंद्रशेखर से जुड़ी नायब अदालत से इसे न्यायाधीश को देने के लिए कहा था.

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ठळक मुद्देविशेष न्यायाधीश किरण बंसल ने तीन लोगों एएसआई तारा दत्त, मुकुल कुमार, जिस उम्मीदवार की ओर से रिश्वत की पेशकश की गई थी और एक रमेश कुमार को दोषी ठहराया.चौथे आरोपी दयानंद शर्मा एमसीडी में स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट थे. मुकदमे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई और उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई.

नई दिल्ली:दिल्ली की एक अदालत ने दोषियों में से एक की भर्ती में मदद करने के लिए एक न्यायाधीश को रिश्वत देने के लिए दिल्ली पुलिस के एक सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) सहित तीन लोगों को दोषी ठहराया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, विशेष न्यायाधीश किरण बंसल ने तीन लोगों एएसआई तारा दत्त, मुकुल कुमार, जिस उम्मीदवार की ओर से रिश्वत की पेशकश की गई थी और एक रमेश कुमार को दोषी ठहराया.

इस मामले के चौथे आरोपी दयानंद शर्मा एमसीडी में स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट थे. मुकदमे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई और उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई.

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 2017 में हुई थी. दोषी दत्त तीस हजारी अदालत में 50 हजार रुपये का एक लिफाफा लेकर आया था और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंद्रशेखर से जुड़ी नायब अदालत से इसे न्यायाधीश को देने के लिए कहा था.

लिफाफा न्यायाधीश को दिया जाना था, जो उस समय भर्ती समिति के सदस्य थे, ताकि वह दिल्ली जिला अदालतों में एक चपरासी के पद के लिए मुकुल का पक्ष ले सकें. शर्मा पर आरोप था कि उन्होंने दत्त से जज को रिश्वत देने को कहा था.

उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के एक मामले में एक आपराधिक साजिश (120-बी) का हिस्सा होने का दोषी ठहराया गया था.

अदालत ने तीन लोगों को यह कहते हुए दोषी ठहराया कि नायब अदालत की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद थी, आरोपी व्यक्तियों के कॉल रिकॉर्ड से पता चलता है कि वे उस समय संपर्क में थे और तीस हजारी कोर्ट में दत्त की उपस्थिति उस समय सीसीटीवी फुटेज और उनके मोबाइल फोन के स्थान के माध्यम से स्थापित की गई थी.

बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने अलग-अलग, असंगत और एक-दूसरे के विरोधाभासी बयान दिए थे.

अदालत ने कहा कि एक समझदार इंसान केवल बातचीत के मुख्य उद्देश्य को याद कर सकता है और उससे यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह किसी भी बातचीत के दौरान कहे गए सटीक शब्दों को फिर से दोहराएगा.

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