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आरपीएफ कर्मियों को ‘कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923’ के तहत 'कामगार' माना जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा-ड्यूटी के दौरान लगी चोट के लिए मुआवजे का दावा कर सकते हैं...

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: September 29, 2023 21:04 IST

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने आरपीएफ की एक इकाई, रेलवे सुरक्षा विशेष बल (आरपीएसएफ) के एक कमांडिंग ऑफिसर की ओर से दायर अपील खारिज कर दी, जिसमें गुजरात उच्च न्यायालय के 2016 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

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ठळक मुद्देकांस्टेबल के परिजनों को ‘कर्मचारी मुआवजा’ आयुक्त की ओर से जारी मुआवजा आदेश बरकरार रखा था। रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम, 1957 के आधार पर केंद्र के सशस्त्र बलों का सदस्य था।रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत देय मुआवजे के लाभ से बाहर करने का विधायी इरादा नहीं था।

नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) कर्मियों को ‘कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923’ के तहत 'कामगार' माना जा सकता है और वे ड्यूटी के दौरान लगी चोट के लिए मुआवजे का दावा कर सकते हैं, भले ही यह (आरपीएफ) केंद्र सरकार का एक सशस्त्र बल है।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने आरपीएफ की एक इकाई, रेलवे सुरक्षा विशेष बल (आरपीएसएफ) के एक कमांडिंग ऑफिसर की ओर से दायर अपील खारिज कर दी, जिसमें गुजरात उच्च न्यायालय के 2016 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने ड्यूटी के दौरान शहीद हुए कांस्टेबल के परिजनों को ‘कर्मचारी मुआवजा’ आयुक्त की ओर से जारी मुआवजा आदेश बरकरार रखा था। पीठ की ओर से न्यायमूर्ति मिश्रा ने फैसला लिखा। पीठ ने विचार के लिए दो प्रश्न तैयार किए, जिसमें यह भी शामिल था कि क्या एक आरपीएफ कांस्टेबल को 1923 के कानून के तहत एक ‘कामगार’ माना जा सकता है, भले ही वह रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम, 1957 के आधार पर केंद्र के सशस्त्र बलों का सदस्य था।

पीठ ने विभिन्न प्रावधानों और अधिनियमों पर गौर करने के बाद कहा, “हमारे विचार में, आरपीएफ को केंद्र के सशस्त्र बल के रूप में घोषित करने के बावजूद, इसके सदस्यों या उनके उत्तराधिकारियों को 1923 के अधिनियम या रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत देय मुआवजे के लाभ से बाहर करने का विधायी इरादा नहीं था।”

शीर्ष अदालत ने आरपीएफ की इस दलील को खारिज कर दिया कि मृत कांस्टेबल के उत्तराधिकारियों का मुआवजा दावा स्वीकार करने योग्य नहीं है क्योंकि वह केंद्र के सशस्त्र बल में था और उसे 1923 के कानून के तहत कामगार के रूप में नहीं माना जा सकता है। इसमें कहा गया है, "हमारा मानना है कि 1923 अधिनियम के तहत प्रतिवादी द्वारा किया गया दावा स्वीकार करने योग्य है।

(उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर) अपील में दम नहीं है और तदनुसार खारिज की जाती है।" मौजूदा मामला एक कांस्टेबल से संबंधित है, जो 27 दिसंबर 2006 को आरपीएफ में शामिल हुआ था और 23 अप्रैल 2008 को नौकरी के दौरान एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। मृतक की उम्र 25 वर्ष थी और उसे 8,000 रुपये मासिक वेतन मिलता था।

आयुक्त ने उनके उत्तराधिकारियों को देय मुआवजा 4.33 लाख रुपये निर्धारित किया और आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर नौ प्रतिशत ब्याज के साथ राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया। उच्च न्यायालय ने आयुक्त के आदेश की पुष्टि करते हुए आरपीएफ की अपील खारिज कर दी थी, और इसके बाद आरपीएफ ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया था।

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