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मध्य प्रदेशः गुटबाजी के बाद वंशवाद पर उठे सवाल, कांग्रेस विधायक ने कहा- मैं मंत्री पुत्र नहीं था इसलिए नहीं बनाया मिनिस्टर

By राजेंद्र पाराशर | Updated: December 28, 2018 20:19 IST

डॉ. हीरा अलावा के बाद अब राजवर्धन सिंह दत्तीगांव ने मोर्चा खोला और मंत्री न बनाए जाने का कारण गिनाया कि वे मंत्री पुत्र नहीं है, इसके कारण उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. सिंधिया समर्थक दत्तीगांव ने इस्तीफा तक देने की बात कह डाली. वहीं कुछ विधायक मंत्री न बनने की पीड़ी को लेकर दिल्ली पहुंच गए हैं.

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मध्यप्रदेश में 15 साल के वनवास को खत्म कर वापस सत्ता में लौटी कांग्रेस के लिए सरकार चलाना मुश्किल होता जा रहा है. एक ओर सहयोगी दल बसपा, सपा और निर्दलीय मंत्री पद के लिए दबाव की राजनीति कर रहे हैं, तो दूसरी और कांग्रेस के अपने विधायकों ने भी मंत्री बनने के लिए इसी तरह का दबाव बढ़ा दिया है. 

डॉ. हीरा अलावा के बाद अब राजवर्धन सिंह दत्तीगांव ने मोर्चा खोला और मंत्री न बनाए जाने का कारण गिनाया कि वे मंत्री पुत्र नहीं है, इसके कारण उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. सिंधिया समर्थक दत्तीगांव ने इस्तीफा तक देने की बात कह डाली. वहीं कुछ विधायक मंत्री न बनने की पीड़ी को लेकर दिल्ली पहुंच गए हैं.

कांग्रेस की सरकार बनने और कमान कमलनाथ के हाथ आने के बाद मंत्रिमंडल गठन में गुटबाजी कुछ इस तरह हावी रही कि पांच दिन से ज्यादा समय मंत्रिमंडल गठन में लगा. मंत्री शपथ लेते उसके पहले से ही विवाद और बगावत के सुर उठने लगे. पहले कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े डॉ. हीरा अलावा ने मोर्चा खोला, फिर वरिष्ठ विधायक के.पी.सिंह के समर्थक धरने पर बैठे. 

इसके बाद एंदल सिंह कंसाना के समर्थकों ने तो चक्काजाम कर दिया और ब्लाक कांग्रेस अध्यक्ष मदन शर्मा ने इस्तीफा तक दे डाला. इसके बाद बिसाहुलाल तो अपने आका दिग्विजय के सामने फूंट-फूंट कर रो दिए. विवाद जब नहीं सुलझा तो इन नेताओं ने दिल्ली जाकर राहुल गांधी से अपनी पीड़ा सुनाने की बात कही और दिल्ली पहुंच गए. इस मामले में नया नाम अब राजधवर्धन सिंह दत्तीगांव का जुड़ा है. 

राजवर्धन सिंह ने अपने को सिंधिया समर्थक होने की बात कही और दावा किया कि उन्हें टिकट सिंधिया ने दी अब जब उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया तो वे सिंधिया को अपना इस्तीफा सौंप देंगे. इतना ही नहीं दत्तीगांव ने साफ कहा कि वे किसी मंत्री या वरिष्ठ नेता के पुत्र नहीं है, इसके लिए उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया.

उल्लेखनीय है कि मंत्रिमंडल में दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह,पूर्व मंत्री इंद्रजीत पटेल के पुत्र कमलेश्वर पटेल, पूर्व मंत्री प्रताप सिंह के पुत्र सुरेन्द्र सिंह हनी बघेल, पूर्व उप मुख्यमंत्री जमुनादेवी के भतीजे उमंग सिंगार, दिग्विजय सिंह के भतीजे प्रियव्रत सिंह और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुभाष यादव के पुत्र को मंत्री बनाया गया है. इसे लेकर दत्तीगांव ने सीधा निशाना साधा है.

निर्दलीय भी हैं नाराज

कांग्रेस को सरकार बनाने में चार निर्दलीय प्रत्याशियों सुरेन्द्र सिंह ठाकुर, केदार डाबर, जेवियर मेढ़ा ने कांग्रेस की समस्या को बढ़ा दिया है. इनका साथ सपा के राजेश शुक्ला, बसपा की रामबाई और बसपा के संजीव सिंह भी हैं. ये भी मंत्री न बनाए जाने को लेकर नाराज हैं. सपा विधायक के समर्थन में तो अखिलेश तक ने अपनी नाराजगी जता दी है. वहीं बसपा विधायकों की माने तो वे भी पार्टी के निर्देश पर ही विरोध कर रहे हैं, इसका सीधा मतलब है कि मायावती भी उनके विधायकों को मंत्री बनवाना चाहती हैं. ये सभी इस बात का दावा कर रहे हैं कि हमारे बिना कांग्रेस सरकार नहीं चला सकती और कांग्रेस को उन्हें मंत्री बनाना ही होगा. यह अलग बात है कि अब कांग्रेस की ओर से क्या कदम उठाया जाता है और इन रुठों को वरिष्ठ नेता कैसे मनाते हैं.

विभागों बंटवारे को लेकर नहीं बना तालमेल

कमलनाथ के सामने नई मुसीबत उनके 28 मंत्रियों के बीच विभागों के वितरण की भी है. राजधानी में दो दिन की मशक्कत के बाद भी वे मंत्रियों की पसंद के चलते विभागों का वितरण नहीं कर पा रहे हैं. अब मामला दिल्ली राहुल गांधी तक पहुंच गया है. राहुल गांधी भी इस मसले को विवाद के बिना सुलझाना चाहते थे, मगर जब मामला नहीं सुलझा तो उन्होंने सारे वरिष्ठ नेताओं को अब दिल्ली बुलाकर मामले को निपटाने की बात कही है. दिल्ली में ये सभी नेता पहले मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और फिर मंत्रिमंडल गठन के लिए राहुल गांधी के साथ चर्चा कर चुके थे. अब तीसरी बार विभाग वितरण को लेकर चर्चा करेंगे.

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