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इंदिरा गांधी की गाड़ी क्रेन से उठवाने का किस्सा सुनाकर मशहूर हुईं किरण बेदी, बाद में निकला झूठ 

By खबरीलाल जनार्दन | Updated: June 9, 2018 10:37 IST

आज किरण बेदी का जन्मदिन है। वह पुडुचेरी की राज्यपाल हैं। उनकी नियुक्ति बीजेपी सरकार ने की है।

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ठळक मुद्देदिल्ली में किरण बेदी को क्रेन बेदी के नाम से जाना जाता थाइंदिरा गांधी की कार उठवाने वाली घटना की असलियत वैसी नहीं जैसी किरण बेदी बताती हैंबतौर पहली महिला आईपीएस अधिकारी वह आज भी कितनी ही लड़कियों की आदर्श हैंउन्होंने स्वेच्छा आईपीएस की नौकरी छोड़कर समाजसेवा के रास्ते राजनीति का चुनाअन्ना आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उसी आंदोलन से निकली पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ादिल्ली में वह बीजेपी की सीएम कैंडिडेट रहीं, लेकिन उनकी अगुवाई में बीजेपी का सूपड़ा साफ हो गया

"साल 1982 में मैं दिल्‍ली की ट्रैफिक पुलिस में डेप्युटी कमिश्नर ऑफ पुलिस थी। तब लोग मुझे किरण बेदी के बजाय क्रेन बेदी कहते थे। क्योंकि मैने शहर में कई सारी क्रेन छोड़ रखी थीं। वे क्रेन ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों की गाड़िया उठा लिया करती थीं। यहां तक की तत्कालीन प्रधानमंत्री इं‌दिरा गांधी के बेटे राजवी गांधी को एक बार जब एक मैच देखने के लिए स्‍टेडियम जाना था तो वे ट्रैफिक पुलिस के लोगों को बुलाकर पार्किंग जोन के बारे में पूछा। लेकिन इससे बड़ी बात 16 अगस्त 1982 को हुई। हमारी पेट्रोलियम गाड़ी कनॉट प्लेस पर घूम रही थी। तभी एक गाड़ी सड़क पर खड़ी दिखी। हमारे सब इंस्पेक्टर ने उस गाड़ी को वहां से गाड़ी हटाने को कहा, लेकिन गाड़ी के ड्राइवर ने धौंस दिखानी शुरू दी। गाड़ी के ड्राइवर ने बताया कि यह गाड़ी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की है। हमारे सब इंस्पेक्टर ने कहा कि फिर भी आपको गाड़ी यहां से हटानी पड़ेगी, क्योंकि इससे रास्ता रुक रहा है। जब ड्राइवर ने गाड़ी नहीं हटाई तो एसआई ने गाड़ी को क्रेन से उठवा दीं। उसके बाद मुझे बड़े अधिकारियों के फोन आने शुरू हो गए। लेकिन मैंने कहा मैं उस सब इंस्पेक्टर को सम्मानित करूंगी जिसने ऐसा किया।"

यह लाइनें किरण बेदी ने एक स्टूडेंट के सवाल के जवाब में बोली थीं। स्टूंडेंट काउंसिलिंग की एक सेमिनार में एक छात्रा का सवाल था कि मैं आईपीएस अधिकारी बनना चाहती हूं लेकिन मुझे राजनीतिज्ञों से डर लगता है। क्या ऐसा वास्तव में होता है। इस सवाल के जवाब में छात्रा में जोश भरते हुए किरण बेदी ने यह किस्सा सुनाया था। लेकिन यह पहला मौका नहीं था जब इस घटना के बारे में सार्वजनिक जगह पर किरण बेदी बोल रही थीं। उन्होंने साल 1982 से साल 2015 में भारतीय जनता पार्टी की ओर से दिल्ली की मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने तक चुनाव प्रचार करने तक यह किस्सा करीब बीसियों बार सुनाया होगा। लेकिन इस घटना असलियत ठीक ऐसी नहीं थी जैसी किरण बेदी सुनाती हैं।

किरण बेदी की अपनी वेबसाइट है, kiranbedi.com। इस पर तमाम जानकारियों के साथ इंदिरा गांधी की गाड़ी उठवाने वाली खबर लिखी हुई कुछ अखबारों की कतरनें भी प्रकाशित की गईं। लेकिन किरण बेदी की ओर से ही प्रकाशित अखबारी करतनों की खबरों को पूरी पढ़ें तो पता चलता है- कनॉट प्लेस में सफेद ऐंबैस्डर DHD1817 एक गाड़ी ठीक करने वाली दुकान के सामने खड़ी थी। उसकी पार्किंग नियमों के मुताबिक नहीं थी। तभी वहां सब इंस्पेक्टर निर्मल सिंह पहुंचे। उन्होंने उस दुकान को इसका जिम्मेदार मानते हुए दुकान का चालान काट दिया। वहां मौजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सुरक्षाकर्मियों ने निर्मल सिंह को गाड़ी बारे में सूचना दी। लेकिन उन्होंने कहा चालान कटेगा चाहे गाड़ी वीआईपी की ही हो। यानी वहां महज दुकानदार का चालान काटा गया था। ना कि गाड़ी को क्रेन से उठवाया गया था।

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इस घटना में किरण बेदी की भूमिका महज इतनी थी कि जब इंदिरा गांधी देश वापस लौटीं तो पूरे मामले पर जांच बिठाई गई। उस वक्त किरण बेदी ने घटना को सार्वजनिक कर दिया और अपने एसआई का पक्ष लिया। इससे एसआई की तारीफ हुई कि उन्होंने डरे बगैर चालान काटा।

लेकिन कितनी ही जगहों पर किरण बेदी ने ऐसे बयान दिए- 'जब मैंने इंदिरा गांधी की कार उठाने का फैसला किया तो मुझे यह बात भलीभांति पता थी कि अब मेरा ट्रांसफर करा दिया जाएगा। हुआ भी वही मुझे दिल्ली ट्रैफिक पुलिस से हटा कर गोवा भेज दिया गया। लेकिन मैंने हमेशा वही किया है जो मुझे ठीक लगा है।'

हालांकि देश की पहली महिला भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी के तौर पर किरण बेदी अब भी कितनी ही महिलाओं के लिए आदर्श हैं। उनका जन्म 9 जून, 1949 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई सैक्रेड हार्ट कन्वेंट स्कूल, अमृतसर में ही हुई। इसके बाद उन्होंने इंग्लिश में बीए (आनर्स), राजनीति विज्ञान में एमए किया। इसके बाद आईआईटी दिल्ली से उन्होंने डॉक्ट्‍रेट की मानद उपाधि ली।

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जुलाई 1972 में वह सिविल सेवा के लिए चयनित हुईं। तब उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा को चुना। अपने जोशीले फैसलों को लेकर कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक शीर्षकों के साथ वह हमेशा अखबारों में बनी रहीं। उन्होंने नशीले पदार्थों के नियंत्रण, यातायात प्रबंधन और वीआईपी सुरक्षा, जेल पुनर्निमाण में अहम भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने स्वेच्छा नौकरी छोड़कर समाजसेवा के रास्ते राजीनति में आईं।

अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन में वह सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रहीं। लेकिन आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी के खिलाफ ही साल 2015 में बतौर बीजेपी सीएम कैंडिडेट चुनाव लड़ीं। लेकिन इससे में उन्हें करारी मात मिली। 70 सीटों वाली दिल्ली में किरण बेदी की अगुवाई वाली बीजेपी 3 सीटों पर सिमट गई। खुद किरण बेदी अपनी सीट नहीं बचा पाईं। 31 मई 2016 को किरण बेदी को बीजेपी ने पुडुचेरी का राज्यपाल नियुक्त किया।

पढ़ने और प्रशासनिक कामों के अलावा किरण बेदी को टेनिस खेलने का शौक था। इसमें उन्होंने ऑल-एशियन टेनिस चैम्पियनशिप और एशियन लेडीज टाइटल जैसी ट्रॉफियां भी जीती थीं। उन्होंने 'इट्स ऑलवेज़ पॉसीबल' और 'लीडर एंड गवर्नेंस' नाम की दो किताबें भी लिखी हैं।

टॅग्स :किरण बेदीभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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