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पत्रकार सिद्दीकी कप्पन जमानत के लिए पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, 2020 से यूपी की जेल में हैं बंद

By आशीष कुमार पाण्डेय | Updated: August 24, 2022 21:30 IST

यूपी की जेल में बंद पत्रकार सिद्दीकी कप्पन इस महीने के शुरूआत में इलाहाबाद हाईकोट की लखनऊ बेंच द्वारा जमानत याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।

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ठळक मुद्देपत्रकार सिद्दीकी कप्पन ने जेल से रिहाई के लिए खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा इलाहाबाद हाईकोट ने महीने के शुरूआत में कप्पन की जमानत याचिका को खारिज कर दिया थायूपी पुलिस ने अक्टूबर 2020 में सिद्दीकी कप्पन को हाथरस जाते समय रास्ते में गिरफ्तार किया था

दिल्ली: केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन ने जेल से रिहाई के लिए अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कप्पन को यूपी पुलिस ने अक्टूबर 2020 में हाथरस जाते हुए उस समय गिरफ्तार किया था, जब वो कथित तौर पर एक दलित युवती के साथ हुए गैंगरेप और बाद में उसकी हत्या की रिपोर्टिंग करने के लिए जा रहे थे।

जानकारी के मुताबिक कप्पन इलाहाबाद हाईकोट की लखनऊ बेंच द्वारा इस महीने की शुरुआत में जमानत याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। सिद्दीकी कप्पन पर पर यूपी पुलिस ने कथित तौर पर हाथरस मामले में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत केस दर्ज किया था और अक्टूबर 2020 से ही वो इस मामले में जेल में बंद हैं।

कप्पन ने बुधवार को जमानत याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस एनवी रमण की बेंच के समक्ष आग्रह किया लेकिन कोर्ट ने समय के अभाव का हवाला देते हुए मामले को सुनवाई के लिए 26 अगस्त को लिस्ट किया है।

सिद्दीकी कप्पन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील हारिस बीरन ने चीफ जस्टिस की बेंच के सामने कहा कि पूर्व में जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस सीटी रविकुमार कप्पन की याचिका पर सुनवाई कर चुके हैं और दोनों जजों ने कप्पन को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

इसके साथ ही कप्पन की याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ता कथित तौर पर यूएपीए के आरोपों में लगभग दो साल सलाखों के पीछे बंद है और वो भी केवल इसलिए कि वो हाथरस में हुए गैंगरेप और हत्या के मामले पर रिपोर्टिंग करने के लिए गये हुए थे, जो कि उनका पेशेवर कर्तव्य था।"

सु्प्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह भी कहा है कि वर्तमान याचिका स्वतंत्रता के अधिकार और संविधान प्रदत्त स्वतंत्र मीडिया में निहित अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता के हनन का भी प्रश्न उठा रही है। याचिका में दावा किया गया है कि हाईकोर्ट में भी इन तथ्यों की ओर ध्यान दिलाया गया था लेकिन हाईकोर्ट उन तथ्यों पर ध्यान देने में विफल रहा है। हाईकोर्ट के सामने इस मुद्दे को भी उठाया गया था कि कप्पन के खिलाफ दायर यूपी पुलिस के आरोप पत्र में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 17 और 18 का मामला नहीं बनता है।

यूएपीए की धारा 17 आतंकवादी कृत्य के लिए धन जुटाने की सजा से संबंधित है, वहीं धारा 18 साजिश रचने से संबंधित है लेकिन ये दोनों धाराएं कप्पन के संबंध में लागू नहीं होती हैं। मालूम हो कि यूपी पुलिस ने अक्टूबर 2020 में कप्पन सहित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से कथित संबंध रखने वाले चार लोगों के खिलाफ यूएपीए सहित कई अन्य धाराओं में केस दर्ज किया था।

यूपी पुलिस ने पहले दावा किया था कि कप्पन सहित सभी आरोपी हाथरस में कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से पहले मथुरा की कोर्ट ने भी कप्पन की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

सिद्दीकी कप्पन 14 सितंबर को गैंगरेप की शिकार हुए दलित पीड़िता के मामले को कवर करने जा रहे थे। पुलिस के मुताबिक पीड़िता के साथ गांव के चार लोगों ने गैंगरेप किया था, जिसमें बुरी तरह से घायल पीड़िता की मौत लगभग 15 दिनों के बाद दिल्ली के एक अस्पताल में हो गई थी। आरोप है कि मौत के यूपी पुलिस ने पीड़िता का अंतिम संस्कार आधी रात को उसके गांव में कर दिया था।

उस मामले में पीड़िता के परिवार वालों का दावा था कि कि पुलिस ने जबरिया आधी रात को बिना उनकी सहमति के शव का अंतिम संस्कार कर दिया था। (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

टॅग्स :Siddiqui Kappansupreme courtउत्तर प्रदेशAllahabad High Courtup police
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