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नीट-पीजी में ईडब्ल्यूएस कोटा: याचिकाकर्ताओं ने कहा- 8 लाख की सीमा तय करने से पहले कोई अध्ययन नहीं किया गया, आज भी जारी रहेगी सुनवाई

By विशाल कुमार | Updated: January 6, 2022 08:57 IST

केंद्र ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि रुकी हुई नीट-पीजी काउंसलिंग को चलने दिया जाए क्योंकि रेजिडेंट डॉक्टरों की मांग वाजिब है और देश को नए डॉक्टरों की जरूरत है, भले ही ईडब्ल्यूएस कोटे की वैधता का मामला विचाराधीन हो। 

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ठळक मुद्देसुप्रीम कोर्ट में आज भी जारी रहेगी नीट-पीजी में ईडब्ल्यूएस कोटा पर सुनवाई।केंद्र ने कहा कि ओबीसी या ईडब्ल्यूएस की श्रेणी में आने वाले लोगों को उनके वैध अधिकार से वंचित रखने की स्थिति को स्वीकार नहीं करेगा।

नई दिल्ली: वर्ष 2021-22 शैक्षणिक वर्ष से ओबीसी और ईडब्ल्यूएस कोटा के कार्यान्वयन के लिए 29 जुलाई, 2021 की अधिसूचना को चुनौती देने वाले नीट-पीजी उम्मीदवारों ने आठ लाख रुपये की आय मानदंड लागू करने के सरकार के औचित्य का विरोध करते हुए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि इसे लेकर कोई अध्ययन नहीं किया गया।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ए.एस. बोपन्ना की पीठ ने कहा कि मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी, जिसके बाद वह कुछ आदेश पारित करेंगे।

याचिकाकर्ता उम्मीदवारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि आठ लाख रुपये की आय के मानदंड को बनाए रखने के लिए समिति की सिफारिश को स्वीकार करने के केंद्र के औचित्य पर उनके पास कहने के लिए काफी कुछ है। 

उन्होंने कहा कि चूंकि परीक्षा पुरानी प्रणाली (ओबीसी और ईडब्ल्यूएस कोटा के बिना) के अनुसार आयोजित की गई थी इसलिए अदालत मौजूदा शैक्षणिक वर्ष के लिए पुरानी प्रणाली के अनुसार नीट-पीजी काउंसलिंग की अनुमति दे सकती है। 

वहीं, केंद्र ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह उस स्थिति को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की श्रेणी में आने वाले लोगों को उनके किसी वैध अधिकार से वंचित रखा जाए, फिर चाहे आठ लाख रुपये की वार्षिक आय के मानदंड पर फिर से विचार करने से पहले या बाद का मामला हो। 

केंद्र ने अदालत से आग्रह किया कि रुकी हुई नीट-पीजी काउंसलिंग को चलने दिया जाए क्योंकि रेजिडेंट डॉक्टरों की मांग वाजिब है और देश को नए डॉक्टरों की जरूरत है, भले ही ईडब्ल्यूएस कोटे की वैधता का मामला विचाराधीन हो। 

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ''हम, एक सरकार के रूप में, अदालत से अनुरोध करेंगे कि हम किसी भी स्थिति को स्वीकार नहीं करेंगे, जिससे ओबीसी या ईडब्ल्यूएस वर्ग किसी ऐसी चीज से वंचित हो जो उन्हें वैध रूप से देय है, चाहे वह अभ्यास से पहले या बाद में हो।'' 

उन्होंने कहा कि कोटा के लिए अधिसूचना जनवरी, 2019 की है और ईडब्ल्यूएस आरक्षण पहले ही कई नियुक्तियों और प्रवेशों पर लागू किया जा चुका है। 

मेहता ने कहा, ''हम एक ऐसे बिंदु पर हैं जहां काउंसलिंग अटकी हुई है। हमें इस समय में डॉक्टरों की आवश्यकता है। हम रिपोर्ट पर अदालत की सहायता के लिए तैयार हैं लेकिन हम लंबी बहस में नहीं जा सकते। किसी भी रिपोर्ट की तरह, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति रिपोर्ट में त्रुटियों को इंगित कर सकता है हालांकि, सवाल यह होगा कि क्या गरीबों के लिए मानदंड अधिक समावेशी हैं या नहीं?, और मैं इस मुद्दे पर अदालत को संतुष्ट कर सकता हूं।'' 

उन्होंने कहा, ''काउंसलिंग शुरू होने दें। उस चरण को समाप्त होने दें। उस समय, हमें नहीं पता था कि ऐसी स्थिति आएगी। यह रेजिडेंट डॉक्टरों की एक वाजिब मांग है। 

इस बीच, अदालत आपत्तियों पर विचार करे। मेहता ने यह भी कहा कि सरकार के पूर्व वित्त सचिव, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के सदस्य-सचिव और केंद्र के प्रमुख आर्थिक सलाहकार की एक समिति का गठन किया गया था, जिसने 31 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट सौंपी। 

कुछ उम्मीदवारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि वे पहले ही पीठ के समक्ष इस मामले पर बहस कर चुके हैं और अगर अदालत चाहे तो वे फिर से ऐसा कर सकते हैं। 

दीवान ने कहा कि उन्होंने 29 जुलाई की अधिसूचना को चुनौती दी है क्योंकि पिछले साल फरवरी-मार्च में एक बार परीक्षा का नोटिस जारी होने के बाद बीच में नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता।

दीवान ने कहा कि एक बार खेल शुरू होने के बाद नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता है और इस मामले में 29 जुलाई को अधिसूचना जारी की गई थी, जिसमें वर्ष 2021-22 शैक्षणिक वर्ष से ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत और ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का निर्देश दिया गया था। उन्होंने कहा कि इसका असर यह होगा कि सामान्य वर्ग के लिए जो 2,500 सीटें उपलब्ध थीं, वे वापस ले ली जाएंगी।

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