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सीओपी26 में कोयले को ‘चरणबद्ध तरीके से कम करने’ पर भारत के रुख का जलवायु विशेषज्ञों ने किया समर्थन

By भाषा | Updated: November 14, 2021 19:46 IST

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नयी दिल्ली, 14 नवंबर जलवायु विशेषज्ञ, ग्लासगो में सीओपी 26 शिखर सम्मेलन में कोयले का उपयोग ‘‘चरणबद्ध तरीके से बंद करने के बजाय, इसके उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने’’ के भारत के सुझाव के पूरी तरह समर्थन में आ गए हैं। इससे पहले कई देशों ने जीवाश्म ईंधन पर भारत के रुख की आलोचना की।

सीओपी 26 शिखर सम्मेलन में लगभग 200 देश ग्लोबल वार्मिंग संबंधी महत्वपूर्ण लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए शनिवार को एक जलवायु समझौते के लिए तैयार हो गए लेकिन इसमें अंतिम समय में एक बदलाव किया गया जिससे कोयले के बारे में अहम भाषा की कठोरता कम हो गई।

छोटे द्वीपीय देशों समेत कई देशों का कहना है भारत द्वारा कोयले का उपयोग ‘‘चरणबद्ध तरीके से बंद करने के बजाय, इसके उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने’’ के जिस बदलाव को भारत द्वारा बढ़ावा दिया गया उससे वे बहुत अधिक निराश हैं।

एक तरफ जहां कुछ देशों ने निराशा प्रकट की है, वहीं भारत में जलवायु विशेषज्ञों को लगता है कि एक अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौते में भारत द्वारा कोयले को चरणबद्ध तरीके से कम करने का पहली बार उल्लेख ऊर्जा रूपांतरण का महत्वपूर्ण संकेत है। उन्होंने वादे के अनुसार जलवायु संबंधी आर्थिक सहायता नहीं देने के लिए विकसित देशों की आलोचना की।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा, ‘‘सीओपी26 वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमित करने के लिए अंतराल को निश्चित रूप से पाटा है। लेकिन अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा वादे के अनुसार जलवायु वित्तपोषण के लिए 100 अरब डॉलर नहीं देना किसी भी महत्वाकांक्षी जलवायु कार्रवाई में केंद्रीय बिंदु बना हुआ है।’’

इंटीग्रेटिड हेल्थ एंड वेल बींग काउंसिल के सीईओ कमल नारायण ने कहा, ‘‘भारत ने अक्षय ऊर्जा का ढांचा बनाने में जो प्रतिबद्धता और नेतृत्व दर्शाया है और ऐसे स्रोतों से और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य के साथ कोयले को ‘चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने’ के बजाय केवल ‘चरणबद्ध तरीके से कम करने’ की शब्दावली के उपयोग को इस वैश्विक आपात स्थिति से विचलन की तरह नहीं देखा जाएगा।’’

उन्होंने कहा कि सीओपी26 के परिणामों से पर्यावरण कार्यकर्ता मुश्किल से ही खुश होंगे और धीमी रफ्तार के लिए इसकी आलोचना कर सकते हैं, वहीं भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश के लिए वैश्विक हकीकतों तथा वृद्धि की चुनौतियों पर भी विचार करने की जरूरत है।

द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टेरी) से जुड़े मंजीव पुरी ने कहा, ‘‘बहुत कुछ नहीं हुआ। गंभीर और तत्काल घरेलू कार्रवाई के साथ आगे बढ़ने की दिशा में विकसित देशों की ओर से कोई वास्तविक प्रतिबद्धता नहीं जताई गयी।’’

इंडियन ऑटो एलपीजी कॉलिशन के महानिदेशक सुयश गुप्ता के अनुसार पश्चिमी देशों के लिए भारत की ऊर्जा अनिवार्यताओं की अनदेखी करना सही नहीं है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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