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RTI से खुलासा: 5 साल में सरकारी बैंकों की 3 हजार से ज्यादा शाखाओं के वजूद पर असर, 75 फीसदी SBI की

By भाषा | Updated: November 3, 2019 14:58 IST

मध्य प्रदेश के नीमच निवासी आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी साझा की।

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ठळक मुद्देसूचना के अधिकार (आरटीआई) से खुलासा हुआ है कि बीते पांच वित्तीय वर्षों के दौरान विलय या शाखाबंदी की प्रक्रिया से सार्वजनिक क्षेत्र के 26 सरकारी बैंकों की कुल 3,427 बैंक शाखाओं का मूल अस्तित्व प्रभावित हुआ है। इनमें से 75 प्रतिशत शाखाएं देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की प्रभावित हुई हैं।

मध्य प्रदेश के इंदौर में सूचना के अधिकार (आरटीआई) से खुलासा हुआ है कि बीते पांच वित्तीय वर्षों के दौरान विलय या शाखाबंदी की प्रक्रिया से सार्वजनिक क्षेत्र के 26 सरकारी बैंकों की कुल 3,427 बैंक शाखाओं का मूल अस्तित्व प्रभावित हुआ है। खास बात यह है कि इनमें से 75 प्रतिशत शाखाएं देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की प्रभावित हुई हैं।

आलोच्य अवधि के दौरान एसबीआई में इसके पांच सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक का विलय हुआ है। यह जानकारी आरटीआई के जरिये ऐसे वक्त सामने आयी है, जब देश के 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर इन्हें चार बड़े बैंकों में तब्दील करने की सरकार की नयी योजना पर काम शुरू हो चुका है।

मध्यप्रदेश के नीमच निवासी आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी "पीटीआई-भाषा" के साथ रविवार को साझा की। इसके मुताबिक देश के 26 सरकारी बैंकों की वित्तीय वर्ष 2014-15 में 90 शाखाएं, 2015-16 में 126 शाखाएं, 2016-17 में 253 शाखाएं, 2017-18 में 2,083 बैंक शाखाएं और 2018-19 में 875 शाखाएं या तो बंद कर दी गयीं या इन्हें दूसरी बैंक शाखाओं में विलय कर दिया गया।

आरटीआई अर्जी पर मिले जवाब के अनुसार बीते पांच वित्तीय वर्षों में विलय या बंद होने से एसबीआई की सर्वाधिक 2,568 बैंक शाखाएं प्रभावित हुईं।

आरटीआई कार्यकर्ता ने आरबीआई से सरकारी बैंकों की शाखाओं को बंद किये जाने का सबब भी जानना चाहा था। लेकिन उन्हें जवाब नहीं मिला। इस प्रश्न पर केंद्रीय बैंक ने आरटीआई कानून के सम्बद्ध प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि मांगी गयी जानकारी एक सूचना नहीं, बल्कि एक "राय" है।

आरबीआई ने बताया कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ भारतीय महिला बैंक, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला और स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर का विलय एक अप्रैल 2017 से प्रभावी हुआ था। इसके अलावा, बैंक ऑफ बड़ौदा में विजया बैंक और देना बैंक का विलय एक अप्रैल 2019 से अमल में आया था।

इस बीच, सार्वजनिक बैंकों के कर्मचारी संगठनों ने इनके विलय को लेकर सरकार की नयी योजना का विरोध तेज कर दिया है। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) के महासचिव सीएच वेंकटचलम ने "पीटीआई-भाषा" से कहा, "अगर सरकार देश के 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर चार बड़े बैंक बनाती है, तो इन बैंकों की कम से कम 7,000 शाखाएं प्रभावित हो सकती हैं। इनमें से अधिकांश शाखाएं महानगरों और शहरों की होंगी।"

वेंकटचलम ने आशंका जतायी कि प्रस्तावित विलय के बाद संबंधित सरकारी बैंकों का कारोबार घटेगा, क्योंकि आमतौर पर देखा गया है कि किसी बैंक शाखा के बंद होने या इसके किसी अन्य शाखा में विलीन होने के बाद ग्राहकों का उससे आत्मीय जुड़ाव समाप्त हो जाता है। बहरहाल, अर्थशास्त्री जयंतीलाल भंडारी की राय है कि सार्वजनिक बैंकों का विलय समय की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, "छोटे सरकारी बैंकों को मिलाकर बड़े बैंक बनाने से सरकारी खजाने को फायदा होगा। इसके अलावा, बड़े सरकारी बैंक अपनी सुदृढ़ वित्तीय स्थिति के कारण आम लोगों को अपेक्षाकृत ज्यादा कर्ज बांट सकेंगे जिससे देश में आर्थिक गतिवधियां होंगी।"

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