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राजेश बादल का ब्लॉग: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में डोनाल्ड ट्रम्प की किरकिरी

By राजेश बादल | Updated: September 10, 2019 14:44 IST

तालिबान और अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी से ट्रम्प की बैठक रविवार को प्रस्तावित थी. अचानक बैठक रद्द करने के ऐलान से सभी पक्षों की साल भर की कवायद  पर पानी फिर गया है.

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ठळक मुद्देबैठक रद्द होने के बाद तालिबान ने तो कह दिया है कि इससे अमेरिका का अधिक नुकसान होगा.कई यूरोपीय मुल्कों से अमेरिका के संबंध इन दिनों वैसे नहीं रहे हैं, जैसे बराक ओबामा के दिनों में थे.

दुनिया के सबसे बड़े चौधरी डोनाल्ड ट्रम्प की भवें तनी हैं. हर दांव उल्टा लग रहा है. इसलिए उनकी परेशानी का सबब समझा जा सकता है. दूसरा कार्यकाल पाने के लिए वे चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं लेकिन समीकरण अनुकूल नहीं दिखाई देते. तालिबान के साथ समझौते के एकदम करीब जाकर कदमताल करते लौट आए हैं. नौ गुपचुप वार्ताओं के बाद लग रहा था कि वे अमेरिकी जनता से किया वादा निभा सकेंगे.

बरसों से उनके सैनिकों की अफगानिस्तान में मौजूदगी और उन पर लगातार हमले अमेरिकी समुदाय के लिए गंभीर चिंता का विषय है. बीते अठारह साल में तालिबानियों ने नाटो फौज के करीब साढ़े तीन हजार सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया है. इनमें से लगभग ढाई हजार सैनिक तो अमेरिका के ही हैं और अमेरिकी जनता अपने लोगों की इस तरह हो रही मौतों से बेहद दुखी है. आम अमेरिकी मानता है कि उनके बच्चे अफगानिस्तान में अपने देश की आजादी के लिए नहीं लड़ रहे हैं. अगर यह अमेरिका का मुक्ति संग्राम होता तो सैनिकों का बलिदान समझ में आता. अफगानिस्तान में तो वे बेवजह मारे जा रहे हैं. तालिबानियों ने हाल ही में अपने हमले में काबुल के पास 12 लोगों को मार डाला था. इनमें एक अमेरिकी फौजी था. इसके बाद एक बार फिर वहां अवाम का गुस्सा फूटा है. चुनाव के पहले ट्रम्प इस आक्रोश से आशंकित हैं.

तालिबान और अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी से ट्रम्प की बैठक रविवार को प्रस्तावित थी. अचानक बैठक रद्द करने के ऐलान से सभी पक्षों की साल भर की कवायद  पर पानी फिर गया है. तालिबान ने तो कह दिया है कि इससे अमेरिका का अधिक नुकसान होगा. वह अपने देश की सरकार को अमेरिकी कठपुतली मानता है. दूसरी ओरअफगानिस्तान सरकार  समझौते के विरोध में तो पहले दिन से ही थी लेकिन अमेरिका का विरोध करने का साहस उसमें नहीं था. बैठक रद्द करने और समझौते से अमेरिका के पीछे हटने का स्वागत अशरफ गनी करते हैं तो अर्थ साफ है, अशरफ गनी एक हद तक अपने देश में अशांति की जड़ें पाक में देखते हैं. पाक ही तालिबान को समर्थन देता रहा है, इसलिए अमेरिकी ऐलान से पाक भी बेहद निराश हुआ है. परदे के पीछे से इस समझौते के लिए वह साल भर से प्रयास कर रहा था. भारत को इन शिखर वार्ताओं से अलग रखने की वजह पाकिस्तान ही था.

समझौते के बाद तालिबान की अफगानिस्तान सरकार में भागीदारी सुनिश्चित थी. इसका संदेश था, वहां हिंदुस्तान विरोधी कट्टरपंथियों की हुकूमत में वापसी और पाक फौज की अतिरिक्त आमदनी का एक स्रोत फिर बन जाता. अंतर्राष्ट्रीय ड्रग्स इनफोर्समेंट एजेंसी की मानें तो तालिबानी राज में उनके नियंत्नण में अफगानी इलाकों में अफीम उगाई जाती रही है. पाकिस्तान में फौज के संरक्षण में उससे हेरोइन बनाई जाती रही है. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उसकी तस्करी से तालिबान व पाकिस्तानी सेना फलते-फूलते रहे हैं. यह गठजोड़ खतरनाक है. एक बात यह भी है कि पाकिस्तान को अपनी पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर हिंदुस्तान की मौजूदगी अखरती है. ठीक वैसे ही, जैसे 1971 से पहले भारत को अपनी पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के होने से असुरक्षा का अहसास होता था. इसलिए भले ही अफगानिस्तान के विकास कार्यो की बात हो, इस्लामाबाद की त्यौरियां चढ़ी रहती हैं और चीन जब ग्वादर और श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह संचालित करता है तो उसे भारत की घेराबंदी का मनोवैज्ञानिक सुख मिलता है. समझौता रद्द होने से उसका कूटनीतिक मिशन खटाई में पड़ गया है.  तालिबान - अमेरिकी करार नहीं होने से सबसे अधिक घाटा डोनाल्ड ट्रम्प को हुआ है. अपने लोगों में उन्होंने प्रतिष्ठा खोई है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी राजनयिक छवि को इस पहले कार्यकाल में अनेक झटके लगे हैं. वे अमेरिका की सरकार अपने कारोबार की तरह चला रहे हैं. उत्तर कोरिया प्रसंग, चीन से व्यापार का मसला, ईरान के साथ न्यूक्लियर समझौते से बाहर आने और अनेक अंतर्राष्ट्रीय निर्णयों में उनकी दूरदर्शी सोच कहीं नहीं झलकती.

कई यूरोपीय मुल्कों से अमेरिका के संबंध इन दिनों वैसे नहीं रहे हैं, जैसे बराक ओबामा के दिनों में थे. वे कब अपनी बात से मुकर जाएंगे या अपने रवैये पर डटे रहेंगे; इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता. भारत को भी उन्होंने ऐसे ही झटके दिए हैं. एनडीए सरकार ने पहले कार्यकाल में अमेरिका से गहरे रिश्ते बनाए रखने के लिए रूस से अस्थाई तौर पर फासला बनाया था, मगर व्यापार के मसले पर उन्होंने झटका दिया, फिर ईरान के मामले में भारतीय हितों की अनदेखी की. इसके बाद कश्मीर के मामले में बिचौलिए की भूमिका निभाने का प्रस्ताव कर दिया. ट्रम्प ने प्रधानमंत्नी मोदी तक का नाम लेने से गुरेज नहीं किया. बाद में उन्हें इससे पलटना पड़ा. इसके बाद वे तालिबान समझौते के लिए परदे के पीछे से पाकिस्तान की सहायता ले रहे थे, यह जानते हुए भी कि अफगानिस्तान के विकास में हिंदुस्तान की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता.क्या अब तक मिली राजनयिक और कूटनीतिक नाकामियों से डोनाल्ड ट्रम्प कोई सबक सीखेंगे? शायद अभी नहीं.

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