ओपेक को कमजोर करने में क्या ट्रम्प कामयाब हो रहे हैं ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 1, 2026 07:21 IST2026-05-01T07:20:32+5:302026-05-01T07:21:36+5:30

अब यूएई तेल का उत्पादन बढ़ा देगा तो विश्व बाजार में तेल की कीमतें कम होंगी.

Is Trump succeeding in weakening OPEC | ओपेक को कमजोर करने में क्या ट्रम्प कामयाब हो रहे हैं ?

ओपेक को कमजोर करने में क्या ट्रम्प कामयाब हो रहे हैं ?

आपको याद होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से ओपेक को तेल की कीमतों में हेरफेर करने वाला कार्टेल बताते रहे हैं. वे इस बात से खफा रहे हैं कि अमेरिका खाड़ी देशों को सुरक्षा देता है, लेकिन ओपेक देश तेल का उत्पादन घटाकर महंगा तेल बेचते हैं. ट्रम्प की चाहत रही है कि ओपेक का यह एकाधिकार टूटे. वे यहां तक कह चुके थे कि खाड़ी देशों को यदि अमेरिका से सुरक्षा चाहिए तो उन्हें ओपेक से दूरी बनानी होगी. ताजातरीन मामला यह है कि संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने ओपेक और ओपेक प्लस से खुद को अलग कर लिया है.

ओपेक तेल निर्यातक देशों का समूह है. इसका मुख्यालय वियना, ऑस्ट्रिया में है और सऊदी अरब इसका सबसे प्रमुख सदस्य है. एक मई को यूएई अलग हो जाएगा. उसके बाद इस संगठन में अल्जीरिया, कांगो गणराज्य, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब और वेनेजुएला रह जाएंगे. हालांकि यूएई पहला देश नहीं है जो इससे अलग हुआ है.

अंगोला, इक्वाडोर, कतर और इंडोनेशिया जैसे देश ओपेक के सदस्य थे, लेकिन अब अलग हो चुके हैं. ओपेक प्लस में रूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, मेक्सिको, ओमान, बहरीन, मलेशिया, ब्रुनेई और सूडान शामिल हैं, जो ओपेक के साथ मिलकर तेल उत्पादन पर निर्णय लेते हैं. यूएई के ओपेक से बाहर निकलने के कारण ऊर्जा बाजार में भूचाल आने की संभावना है.

अब यूएई तेल-गैस मार्केट में अपनी मर्जी से उत्पादन करेगा और बेचेगा. हाल के वर्षों में जब यूएई ने उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश प्रारंभ किया था, तभी यह सवाल खड़ा होने लगा था कि ओपेक उसे ज्यादा तेल उत्पादन की इजाजत ही नहीं देने वाला है तो वह इतना निवेश क्यों कर रहा है?

दरअसल ओपेक में वही होता रहा है जो सऊदी अरब चाहता रहा है. हाल के दिनों में सऊदी ने चीन के साथ पेंग बढ़ाई है. पाकिस्तान के साथ तो उसका याराना रहा ही है. अमेरिका निश्चित ही सऊदी की ताकत को कम करना चाहता है. यूएई के जाने से ओपेक कमजोर होगा.

ओपेक के कमजोर होने से सऊदी अरब को भी झटका लगेगा. इधर ट्रम्प ने वेनेजुएला को तो अपने कब्जे में कर ही लिया है. ओपेक प्लस के माध्यम से रूस जो दखल देता है, ट्रम्प उसे भी कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं. यानी ट्रम्प भरपूर कोशिश कर रहे हैं कि विश्व के तेल बाजार पर भी अमेरिका का ही पूरा कब्जा रहे. अब यूएई तेल का उत्पादन बढ़ा देगा तो विश्व बाजार में तेल की कीमतें कम होंगी.

जाहिर है कि इसका फायदा भारत को भी मिल सकता है. वैसे भी यूएई भारत का भरोसेमंद दोस्त रहा है. लेकिन असली सवाल है कि केवल यूएई के अलग हो जाने से क्या ओपेक इतना कमजोर हो जाएगा कि उसे ट्रम्प अपनी उंगली पर नचा सकें? अभी कहना कठिन है लेकिन इस आशंका में बहुत दम है कि आने  वाले समय में कुछ और देश ओपेक से अलग हो जाएं! लेकिन एक कल्पना कीजिए कि जब ओपेक बर्बादी के कगार पर पहुंचने वाला हो तो ऐसी स्थिति में यदि वह पेट्रो डॉलर से बाहर आ जाए तो फिर क्या होगा?

क्या दुनिया के दूसरे देश भी यही चाह रहे हैं? कहना मुश्किल है क्योंकि विश्व राजनीति में कब कहां क्या फेरबदल हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता.

Web Title: Is Trump succeeding in weakening OPEC

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