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राजेश बादल का ब्लॉगः श्रीलंका का चीन से मोहभंग और पड़ोसी धर्म

By राजेश बादल | Updated: September 4, 2020 13:57 IST

चीन ने श्रीलंका से अपनी उधारी चुकाने का दबाव बढ़ा दिया था. पिछले दो-तीन महीनों से यह दबाव बढ़ता जा रहा था. राजनीतिक और कूटनीतिक जानकारों का आकलन है कि गलवान घाटी में चीन और भारत की सेनाओं के बीच भिड़ंत के बाद नेपाल और पाकिस्तान चीन के इशारे पर नाचने लगे हैं.

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भारत के खूबसूरत पड़ोसी सिंहल द्वीप श्रीलंका ने चीन को करारा झटका दिया है. उसने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है कि हंबनटोटा बंदरगाह चीन को सौंपना बड़ी भूल थी और भारत के साथ संबंधों में आई दूरी उसके हित में नहीं रही है. कुछ वर्षों से श्रीलंका के साथ चीन की निकटता बढ़ी थी. इस बेमेल रिश्ते ने भारत को असहज बना दिया था. श्रीलंका हालांकि चीन के कर्ज जाल में अभी भी फंसा हुआ है. इसके बावजूद उसका यह कदम चौंकाने वाला माना जा रहा है.

भारत और श्रीलंका सदियों से मित्र राष्ट्रों की तरह ही रहते आए हैं. वहां के सिंहली, बौद्ध, तमिल और मुस्लिम हिंदुस्तान से ही जाकर बसे हैं. कुछ समय के लिए लिट्टे की गतिविधियों के चलते दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई थी. श्रीलंका में तमिल ईलम की मांग कर रहे लिट्टे की उग्रवादी गतिविधियां रोकने के लिए राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने सबसे पहले भारत से ही मदद मांगी थी, लेकिन तमिलनाडु के तमिलों की लिट्टे को मिल रही सहानुभूति के कारण भारत यह अनुरोध स्वीकार नहीं कर सका और महिंदा राजपक्षे चीन की शरण में चले गए. इसके बाद ही दोनों देशों में पींगें बढ़ने लगी थीं. 

उपकृत श्रीलंका और चीन के रिश्तों में यह मधुरता अब तक जारी रही और चीन की आक्रामक विदेश और आर्थिक नीति के शिकंजे में अनेक देशों की तरह श्रीलंका भी उलझ गया. परंतु अब लगता है कि श्रीलंका को अहसास हो चला है कि भारत जिस तरह आड़े वक्त पर उसके काम आ सकता है, वैसा सहयोग चीन से नहीं मिल सकता. संभवतया इसीलिए श्रीलंका के विदेश सचिव एडमिरल जयनाथ कोलंबेज ने विदेश नीति में इस बड़े यूटर्न का ऐलान किया. 

उन्होंने कहा कि श्रीलंका ‘सबसे पहले भारत’ की नीति अपनाएगा और उसके सामरिक सुरक्षा हितों की रक्षा करेगा. उन्होंने खुलासा करते हुए कहा कि श्रीलंका ऐसा कुछ नहीं करेगा जो भारत की सुरक्षा के लिए हानिकारक हो. श्रीलंका यह कभी स्वीकार नहीं कर सकता कि उसका इस्तेमाल किसी अन्य देश- विशेष तौर पर भारत के खिलाफ कुछ करने के लिए किया जाए. श्रीलंका ने हंबनटोटा में बंदरगाह की पेशकश सबसे पहले भारत को की थी. भारत ने उसे नहीं लिया. इसके बाद वह चीन को गया. लेकिन अब श्रीलंका कह सकता है कि बंदरगाह का इस्तेमाल चीन की फौज को नहीं करने दिया जाएगा. भारत उसके लिए सबसे पहले है. अन्य देश उसके बाद.

दरअसल चीन ने श्रीलंका से अपनी उधारी चुकाने का दबाव बढ़ा दिया था. पिछले दो-तीन महीनों से यह दबाव बढ़ता जा रहा था. राजनीतिक और कूटनीतिक जानकारों का आकलन है कि गलवान घाटी में चीन और भारत की सेनाओं के बीच भिड़ंत के बाद नेपाल और पाकिस्तान चीन के इशारे पर नाचने लगे हैं. वे खुल्लमखुल्ला भारत के विरोध पर उतर आए हैं. पाकिस्तान के ऐसा करने के पीछे तो कारण साफ समझ में आता है. नेपाल के व्यवहार में अचानक परिवर्तन भारत के लिए तनिक आश्चर्य की बात थी. सत्तर साल से नेपाल भारत के संरक्षण में ही फल फूल रहा था. अब तो वह भी भारत से जंग की भाषा बोल रहा है. 

कमोबेश श्रीलंका से भी चीन ने यही अपेक्षा की थी. इससे उत्तर, पश्चिम और दक्षिण दिशाओं से भारत की चौतरफा घेराबंदी का दृश्य उपस्थित हो जाता. यह स्पष्ट रूप से भारत को दबाव में डालने की मंशा थी. मगर श्रीलंका ऐसा कर भी नहीं सकता. इसकी वजह यह है कि वह चारों ओर से पानी से घिरा है. यदि चीन उसे अपना अड्डा बनाना भी चाहे तो पहले उसकी नौसेना और वायुसेना को भारत के अधिकार क्षेत्र से गुजरना पड़ेगा. यह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होगा. भारत की सीमाओं का उल्लंघन होने पर उसे श्रीलंका के खिलाफ भी कार्रवाई करने से कोई नहीं रोक सकता. यह चीन की मुश्किलें बढ़ा देता. वह अपने मित्र श्रीलंका की कोई सहायता चाह कर भी नहीं कर पाता. 

नेपाल और पाकिस्तान तो जमीनी तौर पर चीन से जुड़े हैं और वे अपने देश में चीनी सेना को आने की अनुमति दे सकते हैं, पर श्रीलंका कभी ऐसा नहीं कर सकेगा. संभवतया चीन ने अपनी यह मजबूरी समझते हुए बढ़े पैर खींच लिए हैं. श्रीलंका की विदेश नीति में अचानक बदलाव की यह भी एक वजह हो सकती है.

यह हकीकत देर सबेर नेपाल को भी समझ में आएगी. भारत और नेपाल की भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विरासतें समान हैं. नेपाल की अवाम हिंदुस्तान से दूर नहीं जा सकती और चीन को अपना नहीं सकती. विडंबना यह है कि पाकिस्तान की तरह नेपाल की हुकूमत भी चीनी उपकारों के बोझ तले दबी है. वक्त की चाल बदली और अवाम की भावनाओं के अनुरूप नेपाल में नई सरकार आई तो भारत के लिए राहत की बात हो सकती है. 

पाकिस्तान में तो इसकी कोई संभावना नहीं है. गनीमत है कि समय रहते मालदीव और मलेशिया की आंखें खुल गर्इं और वे चीन के चक्रव्यूह से निकल आए. मलेशिया पर एक परियोजना के लिए 23 अरब डॉलर का कर्ज लेने का दबाव चीन डाल रहा था. मलेशिया सरकार के कान खड़े हुए और उसने हाथ जोड़ लिए. इसी तरह मालदीव के लोगों ने अपने वोट के जरिए चीन के समर्थक राष्ट्रपति को हटा दिया. चीन को समझना चाहिए कि उसकी चालें पुरानी पड़ चुकी हैं. आधुनिक विश्व उसके चंगुल में नहीं आने वाला.

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