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दृष्टिकोण बदलिए, दुनिया अधिक खूबसूरत दिखेगी

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: October 30, 2021 12:09 IST

जैसा दृष्टिकोण हो धीरे-धीरे दुनिया वैसी ही बनती चली जाती है। इसी वजह से सकारात्मक विचारों और काम करने की मंशा में निरंतर वृद्धि होना चाहिए। नकारात्मकता छोड़ दी तो दुनिया और सुंदर हो जाएगी। युद्ध, हिंसा, आतंकवाद ये किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकते।

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लोकमत के नागपुर संस्करण की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय अंतरधर्मीय सम्मेलन में ‘धार्मिक सौहाद्र्र के लिए वैश्विक चुनौतियां और भारत की भूमिका’ विषय पर हुई परिषद में नई दिल्ली स्थित अहिंसा विश्वभारती के संस्थापक आचार्य डॉ. लोकेश मुनि के संबोधन के संपादित अंश

बांग्लादेश, अफगानिस्तान, इराक, ईरान, सीरिया सहित दुनिया में अनेक जगहों पर अशांति का माहौल है। ऐसे में सौहार्द का संदेश सभी जगह मजबूती के साथ जाना वक्त की जरूरत है। पूरी दुनिया को भाईचारे और एकता के विचार पर चलने की जरूरत है। हमने भारत देश में जन्म लिया है। जैन परंपरा में भगवान महावीर के अनेकांत दर्शन के विचार और संस्कार मिले, यह हमारा सौभाग्य है। हमें अपने अस्तित्व के साथ दूसरे के अस्तित्व को भी स्वीकार करना चाहिए। अपने विचारों के साथ दूसरों के विचारों का भी आदर करना चाहिए। उससे भी आगे जाकर मैं तो यह कहूंगा कि हम सभी को अपने धर्म का प्रामाणिकता के साथ पालन करना चाहिए और दूसरे पंथों का भी आदर करना चाहिए। इसी से अहिंसा धर्म की वास्तविक शुरूआत होगी। 

धर्म व संप्रदाय एक नहीं हैं। धर्म यह फल के रस की तरह है जिसकी सुरक्षा के लिए कवच है संप्रदाय। हमारा देश धर्मनिरपेक्ष नहीं पंथनिरपेक्ष है। मेरा धर्म, मेरे विचार ही सर्वश्रेष्ठ जैसी बातें होने लगती हैं तो समस्याएं उठ खड़ी होती हैं। अफगानिस्तान-बांग्लादेश में जब धर्मपरिवर्तन करें या देश से चले जाएं, जैसे फतवे निकलते हैं तो यह चिंताजनक पहलू साफ उभरकर सामने आ जाता है। 

मानवता यानी अंतरात्मा, हमें उसे ही धर्म कहना चाहिए। हिंदू या मुसलमान यह सोच काफी बाद की है। उसमें भी धार्मिक उन्माद को कहीं जगह नहीं है। जहां भी सत्य और सकारात्मकता हो, धर्माचार्यो को उसके साथ ही रहना चाहिए। जहां हालात ऐसे न हों, ऐसे लोगों का धर्माचार्यो द्वारा कतई साथ नहीं देना चाहिए। जैन धर्म में सम्यक दर्शन को महत्व हासिल है। जैसा हमारा दृष्टिकोण हो, वैसी ही हमारी दुनिया बनती जाती है, इसी वजह से लोगों को अपना दृष्टिकोण और दुनिया की ओर देखने की नजर बदलनी चाहिए।

एकबार एक व्यक्ति मेले में गया, वहां उसे बोलने वाला एक पक्षी दिखा। उस पक्षी की मधुर आवाज सुनकर हिंदू व्यक्ति को सुनाई दिया, राम लक्ष्मण दशरथ, मौलवी को सुनाई दिया सुभान तेरी कुदरत ..एक मसाला विक्रेता बोला यह पक्षी बोल रहा है हल्दी, मिर्ची ढंक रख ..सब्जी विक्रेता को सुनाई दिया गाजर, मूली, अदरक, तो पहलवान ने सुना दंड, मुद्गल, कसरत ..कहने का मतलब यह कि जो हमारे मन में हो, अनेक बार वही सुनाई देता है। 

जैसा दृष्टिकोण हो धीरे-धीरे दुनिया वैसी ही बनती चली जाती है। इसी वजह से सकारात्मक विचारों और काम करने की मंशा में निरंतर वृद्धि होना चाहिए। नकारात्मकता छोड़ दी तो दुनिया और सुंदर हो जाएगी। युद्ध, हिंसा, आतंकवाद ये किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकते। सकारात्मक संवाद और अहिंसा के मार्ग से हर समस्या को हल किया जा सकता है। कोरोना काल में दुनिया को हमारी महान सनातन परंपरा का महत्व समझ आया। 

संयम आधारित जैन जीवनशैली कितनी गहरी, उपयोगी और भविष्य के दृष्टिकोण वाली है, यह दुनिया को समझ में आ गया। आयुर्वेद, योग, प्राणायाम, संयम आधारित जीवनशैली के कारण हमारे देश में कोरोना की मृत्युदर कम रही। ऐसे हालात में सभी धर्म के लोगों को मिल-बैठकर संवाद साधना चाहिए। चार कदम ही सही, लेकिन साथ चलने का संकल्प लेना चाहिए। अगर हर कोई पहल करें तो यह निश्चित तौर पर आसानी के साथ संभव है। वरना तो दूरियां बढ़ती ही चली जाती हैं, लेकिन कभी न कभी तो मुलाकात और संवाद होना चाहिए।

बात सरल, बलिदान कठिन है,पतन सहज, उत्थान कठिन है।गाता है खंडहर का हर पत्थर,ध्वंस सरल निर्माण कठिन है।

आयुर्वेद, योग-प्राणायाम, संयम पर आधारित जीवनशैली को दोबारा अपना लें। बोलना आसान और करना मुश्किल है, इसीलिए कृति को आसान बनाने लिए कोशिश वक्त की जरूरत है।

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