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विश्वनाथ सचदेव का ब्लॉग: राजनीति को बदनाम न करें, गरिमा बढ़ाएं

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: June 25, 2020 12:28 IST

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ठळक मुद्देअपने चुने हुए नेताओं से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है.भारत उन गिने-चुने राष्ट्रों में से है जहां पिछले 70 साल से जनता के वोट से शासक चुना जाता है

राजनीति की सबसे सरल परिभाषा यह बताई गई है कि शासन करने की कला को राजनीति कहते हैं. एक और परिभाषा के अनुसार यह यानी राजनीति शैतानों की आखिरी शरणगाह है. यह माना जा सकता है कि कला से शरणगाह तक का यह सारा इलाका राजनीति का कार्यक्षेत्र है. इसके बावजूद समाज राजनीति और राजनेताओं को अच्छे अर्थों में ही देखना चाहता है- इसीलिए राजनीति करने वालों को नेता मान लिया गया है.

इसके साथ ही यह भी मान लिया गया है कि राजनीति को घटिया बनाने का काम हमारे द्वारा मान लिए गए नेता ही करते हैं. अर्थात नेता अच्छा है तो राजनीति अच्छी होगी और नेता अच्छा नहीं है तो राजनीति भी अच्छी नहीं हो सकती. सारा दारोमदार हमारे नेताओं पर है. अपने आप में राजनीति को बुरा घोषित करना, इस दृष्टि से उचित नहीं माना जाना चाहिए. तो फिर यह क्यों कहा जाता है कि यह समय राजनीति करने का नहीं है?

यही वाक्य तो हम सुन रहे हैं न आजकल. विपक्ष के नेता बार-बार यह कह रहे हैं कि सत्तारूढ़ दल का नेतृत्व राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने में लगा है और इसके जवाब में सत्तापक्ष विपक्ष को नसीहत देने में लगा है कि देश कोविड महामारी से जूझ रहा है, चीन घुसपैठ की कोशिश में लगा है, पाकिस्तान अपने नापाक इरादों से बाज नहीं आ रहा है, ऐसे में विपक्ष को राजनीति नहीं करनी चाहिए. स्पष्ट है, यहां राजनीति कोई अच्छी चीज नहीं मानी जा सकती. क्या सचमुच राजनीति अच्छी चीज नहीं है?

अब्राहम लिंकन ने जनतंत्र की एक परिभाषा दी थी, ‘जनता की, जनता के लिए, और जनता के द्वारा सरकार’. इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जनतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नागरिक राजनीति अर्थात शासन की कला से वंचित नहीं रह सकता- वंचित नहीं रहना चाहिए. ऐसे में, यदि राजनीति कोई बुरी चीज है, जैसा कि ‘राजनीति मत करो’  वाक्यांश से ध्वनित होता है, तो नागरिक की स्थिति और भूमिका पर सवाल उठना लाजमी है. क्या राजनीति नाम की बुरी चीज से नागरिक पल्ला झाड़ ले? क्या राजनीति को उन्हीं के भरोसे छोड़ दिया जाए जिनकी यह अंतिम शरणगाह  मानी जाती है? इन दोनों सवालों का उत्तर नकारात्मक ही होना चाहिए.

जनतंत्र में नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह अपने राजनेताओं से लगातार सवाल पूछता रहे. जनतंत्र का सच्चा चौकीदार नागरिक ही हो सकता है, कोई और नहीं. दावा तो कोई भी कर सकता है. लेकिन सच्चाई यही है कि हमारी राजनीति को, और हमारे जनतंत्र को उन्हीं ने मैला किया है, जिन्हें हमने राजनीति की चादर को उजला रखने का काम सौंपा था. आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अमानत में खयानत करने वाले अपने नेताओं से पूछें कि शासन करने की कला इतनी बुरी कैसे बन गई कि आप जब चाहे अपने विरोधी को कह देते हैं कि वे राजनीति न करें.

हमने शासन की एक व्यवस्था अपने लिए स्वीकार की जिसमें नागरिकों के समर्थन के आधार पर राजनीतिक दलों को सत्ता संभालने का अवसर मिलता है और आम जनता इन दलों की घोषित नीति के आधार पर समर्थन देती है, और जनता के समर्थन तक सत्ता उस दल या राजनेता के पास रहती है. यह सही है कि हमारा भारत उन गिने-चुने राष्ट्रों में से है जहां पिछले 70 साल से जनता के वोट से शासक चुना जाता है. पर जब हम जनता के चुनाव को राजनेताओं के हाथ का खिलौना बनते देखते हैं तो उन पर नहीं, अपने आप पर तरस आता है. वोटों की खरीददारी, बहुमत के लिए करोड़ों का लेन-देन, निर्वाचित प्रतिनिधियों को बंदी बनाकर रखने की शर्मनाक कोशिशें, मंत्री पद या अन्य कोई लाभ पाने के लिए रातोंरात पाला बदल लेना, यह सब जायज हथियार बन गए हैं हमारी राजनीति के. होना तो यह चाहिए था कि ये सारे हथकंडे अपराध माने जाते, पर ऐसी कोई व्यवस्था हम कर नहीं पाए और ऐसे अपराध करने वालों को ऐसा करने में कभी कोई संकोच नहीं हुआ. वे बेशर्मी से नेता बने रहे और हम इस तरह के राजनीतिक हथकंडे पर एक आपराधिक चुप्पी साधे बैठे रहे. इस सबके चलते ही राजनीति बदनाम हुई है. विडंबना यह है कि आज हमारे नेता राजनीति न करने का उपदेश देते हैं और हम चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं.

अपने चुने हुए नेताओं से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है. जनतंत्र का नायक नेता नहीं, मतदाता होता है. इस नायक की सतत जागरूकता ही जनतंत्र की सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है. इसी जागरूकता का, कसौटी का, तकाजा है कि हम उनपर निगाह रखें जो हमारी राजनीति को गलत निगाहों से देखते हैं. राजनीति के मैले आंचल को साफ करने का दायित्व मतदाता का ही है. उसे ही अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से पूछना है कि उन्होंने हमारी राजनीति को बदनाम क्यों कर दिया है. क्यों राजनीति इतनी बुरी चीज हो गई कि नेता कहते फिरते हैं, इस विषय पर राजनीति मत करो? सत्ता में बैठे अपने प्रतिनिधि से यह पूछने का हक हर नागरिक का है कि सरकार जो कुछ कह रही है उसका आधार क्या है, जो कर रही है उसका औचित्य क्या है? ऐसे किसी भी सवाल को  राजनीति करार देकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कुछ छिपाने की कार्रवाई ही कही जा सकती है. क्यों करे कोई ऐसी कार्रवाई? क्यों सहे कोई यह सब?

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