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विधानसभा चुनाव सेमी-फाइनल क्यों ?

By लोकमत न्यूज़ ब्यूरो | Updated: October 14, 2018 01:29 IST

उत्तर भारत के बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों में सवर्ण ही नहीं बल्किउनके साथ पिछड़ा वर्ग भी गोलबंद होने लगा।

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(एन. के. सिंह  )

उत्तर भारत के बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों में सवर्ण ही नहीं बल्किउनके साथ पिछड़ा वर्ग भी गोलबंद होने लगा। राजनीतिक वर्ग में अगर नेतृत्व जमीन से जुड़ा हो तो उसे चुनाव में मुद्दों को लेकर जन-समर्थन अपनी ओर खींचने का नफा-नुकसान हम विश्लेषकों से पहले समझ में आ जाता है। 

एक उदाहरण देखें। बसपा प्रमुख मायावती की इस क्षेत्र के तीन राज्यों - मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जहां देश की दो प्रमुख पार्टियां ही जनता की पसंद रही हैं - में अपने पिछले वोट प्रतिशत के अनुपात से अधिक सीटों की मांग को कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने नहीं माना और दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव मैदान में जाने का फैसला किया तो आम विश्लेषण यही था कि दोनों का नुकसान हुआ।

लेकिन दरअसल कांग्रेस ने यह समझौता खारिज इसलिए किया क्योंकि उसे डर था कि बसपा से हाथ मिलाकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान  में अगर इस दल के लिए ज्यादा सीटें छोड़ी गईं तो भाजपा से नाराज गैर -अनुसूचित वर्ग जो 80 प्रतिशत है कांग्रेस की तरफ नहीं झुकेगा।

   दूसरा अहम मुद्दा जो इस चुनाव को प्रभावित करेगा वह यह कि किसानों को पिछले साढ़े चार साल में किए गए वादे पर शुरुआत में भरोसा था क्योंकि सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी पर भरोसा था। जमीन पर योजनाओं का क्रियान्वयन न हो पाने के कारण किसानों की वास्तविक स्थिति बिगड़ती गई। योजनाएं अच्छी थीं परंतु राज्य सरकारें अक्षम थीं और अमल करने वाले सरकारी नौकर भ्रष्ट। पिछले दो वर्षो में किसानों ने अपनी उपज तो बढ़ाई परंतु सरकार विपणन (बेचने) की समुचित व्यवस्था नहीं कर पाई और दूसरी ओर खाद और डीजल के दाम किसान की कमर तोड़ते रहे। न्यूनतम समर्थन मूल्य तो अपेक्षित रूप से बढ़ा लेकिन यह ‘बहुत देर कर दी मेहरबां आते -आते’ की मानिंद।  

उत्तर भारत के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव सेमी-फाइनल इसलिए भी हैं क्योंकि तीसरा नया कारण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वैसे तो पूरा देश जाति और उपजाति सरीखे पहचान समूहों में बंटा है लेकिन ये तीन राज्य उसके दिल और फेफड़े की तरह हैं जहां से प्राण-वायु और रक्त का संचालन होता है। लिहाजा इनमें किसी जाति या धर्म में बंटे और अक्सर परस्पर विरोधी पहचान-समूह की भावनाओं में परिवर्तन के संदेश पूरे शरीर के लिए नियामक होते हैं।

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