ममता बनर्जी ने जो कुछ किया, वह शोभनीय नहीं है
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 10, 2026 07:27 IST2026-01-10T07:27:36+5:302026-01-10T07:27:55+5:30
क्या इस तरह केंद्रीय अधिकारियों से फाइल छीनना उनका कद छोटा नहीं करता? ममता को खुद इसके बारे में सोचना चाहिए.

ममता बनर्जी ने जो कुछ किया, वह शोभनीय नहीं है
पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के कोलकाता स्थित दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के बाद जो हुआ, उसे सीधे-सीधे अशोभनीय कहा जाना चाहिए. इस कंसल्टेंसी फर्म के संचालक प्रतीक जैन हैं और यह फर्म चुनावी रणनीति बनाने व तैयारियों में राजनीतिक पार्टियों की मदद करती है. पहले इस कंसल्टेंसी फर्म में प्रशांत किशोर भी थे लेकिन अब वे राजनीति में हैं तो इस फर्म की जिम्मेदारी प्रतीक जैन, ऋषि राज सिंह और विनेश चंदेल देख रहे हैं. प्रतीक जैन के दफ्तर पर जैसे ही प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने छापेमारी शुरू की, तत्काल यह जानकारी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक पहुंची.
आनन-फानन में वे छापेमारी वाली जगह पर पहुंचीं और आरोप है कि उन्होंने जब्त फाइलें प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के हाथों से छीन लीं और अपनी कार में रखवा कर रवाना हो गईं. खासतौर पर हरे रंग की एक फाइल की खूब चर्चा हो रही है कि आखिर उसमें ऐसा क्या है कि उसे छीनने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ा.
इसका जवाब फिलहाल नहीं मिला है लेकिन संदेह तो खड़ा होता ही है कि किसी मुख्यमंत्री को ऐसी हरकत क्यों करनी पड़ी? क्या इस तरह केंद्रीय अधिकारियों से फाइल छीनना उनका कद छोटा नहीं करता? ममता को खुद इसके बारे में सोचना चाहिए. ममता एक राज्य की मुख्यमंत्री हैं और उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपने व्यवहार में शालीनता बरतेंगी. यह सबको मालूम है कि आई-पैक तृणमूल कांग्रेस की आंख, कान, नाक है लेकिन इसका यह अर्थ तो कतई नहीं हो सकता कि उस पर यदि कानूनी एजेंसियां छापा मारती हैं तो मुख्यमंत्री स्वयं मैदान में कूद जाएं.
प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ वे उच्च न्यायालय जा सकती थीं, सर्वोच्च न्यायालय जा सकती थीं लेकिन उन्होंने फाइल छीनने का विकल्प चुना जो सरासर गलत है. प्रवर्तन निदेशालय पर केंद्र के इशारों पर काम करने का आरोप लगाना उनका अधिकार है लेकिन जो कुछ भी हरकत उन्होंने की है, वह न उनका अधिकार है और न ही उन्हें यह शोभा देता है.
उन्हें समझना चाहिए कि राजनीतिक जंग की जो लड़ाई उन्होंने वामपंथी दलों के खिलाफ शुरू की थी, उस लड़ाई के तेवर उस वक्त की जरूरत रही होगी लेकिन अब वे सत्ता में हैं, सड़क पर नहीं हैं. दुर्भाग्य से वे सारा राजनीतिक व्यवहार सड़क पर करने का उतावलापन दिखाती हैं. यह स्थिति ठीक नहीं है. वे संघर्षशील हैं, जनता के बीच उनकी पकड़ है. वे अच्छी नेतृत्वकर्ता हैं लेकिन लोकतांत्रिक मंच को शालीनता प्रदान करने में भी उन्हें सार्थक भूमिका निभानी चाहिए.