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विजय दर्डा का ब्लॉग: क्या ममता का गठबंधन का खेल रंग लाएगा?

By विजय दर्डा | Updated: August 2, 2021 11:04 IST

सोनिया गांधी से ममता बनर्जी की मुलाकात से देश की राजनीति गर्म हो गई है। वे नारा दे रही हैं- 'लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ।'

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अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान ममता बनर्जी जब सोनिया गांधी से मिलने उनके निवास पर जा पहुंचीं तो मुझे अचानक पश्चिम बंगाल चुनाव याद आ गया! ममता के लिए वो राजनीतिक जीवन-मरण का चुनाव था क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें हराने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी. सारे पैंतरे चले जा रहे थे. तब ममता बनर्जी ने यह उम्मीद जरूर की होगी कि भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष पार्टियां समर्थन देंगी. निश्चय ही इसका बड़ा दारोमदार कांग्रेस पर था लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने ममता के साथ कोई ममता नहीं दिखाई.

कांग्रेस ने फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के अनजाने से इंडियन सेक्युलर फ्रंट के साथ चुनावी जुगलबंदी कर ली. ममता के लिए यह अत्यंत नुकसान वाली बात थी. ये बात और है कि ममता की चुनावी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. वे करीब 48 प्रतिशत मतों के साथ फिर सत्ता में लौटीं और कांग्रेस को महज 2 फीसदी मत ही मिल पाए और खाता भी नहीं खुला. 

जाहिर सी बात है कि कांग्रेस के रवैये से ममता नाराज ही रही होंगी लेकिन उन्होंने विपक्षी एकता की खातिर जिस राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है, वह उनके कद को और बड़ा कर रहा है. पश्चिम बंगाल चुनाव की खटास को और अपने गुस्से को दरकिनार करके वे सोनिया गांधी से मिलने उनके निवास पर जा पहुंचीं जहां राहुल गांधी भी मौजूद थे. तो ममता का संदेश स्पष्ट है कि विपक्षी एकता के लिए वे हर उस चौखट पर जाएंगी जहां उम्मीद की किरण है. उनकी मुलाकात हालांकि शरद पवार से नहीं हो पाई लेकिन दोनों की चर्चा फोन पर जरूर हुई है.

पश्चिम बंगाल चुनाव से पूर्व मैंने अपने इसी कॉलम में लिखा था कि ममता बनर्जी फिर सत्ता में लौट कर आएंगी और वे राष्ट्रीय स्तर पर काम करेंगी. इसकी शुरुआत हो गई है. 

ममता बनर्जी में मैं बहुत बदलाव देख रहा हूं. निश्चय ही वे मंजी हुई, बहुत सुलझी हुई और बेबाक राजनीतिज्ञ हैं. उनका सारा जीवन संघर्ष में तपा है. वे वक्त की नजाकत को अच्छी तरह समझ गई हैं. उनकी परिपक्वता इस बात में झलकती है कि पश्चिम बंगाल के विकास की खातिर एक तरफ वे दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलती हैं, तो दूसरी ओर विपक्षी एकता की व्यूह रचना भी करती हैं. 

पत्रकारवार्ता में एक बार फिर ‘लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ’ का नारा बुलंद करती हैं. विपक्षी पार्टियों को उनका संदेश साफ है कि एकजुट होना इस वक्त बहुत जरूरी है. लोकप्रतिनिधि के नाते यह उनका हक भी है. लोकतंत्र में एक अच्छा विरोधी दल होना अत्यंत आवश्यक है और भारतीय राजनीति की स्वस्थ परंपरा भी यही रही है. 

मजबूत विपक्ष की तरफदारी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी करते रहे. इतना ही नहीं अपने आचरण से पंडित नेहरू ने यह दर्शाया भी. राष्ट्रीय कद के कई विरोधी विचारों के नेताओं को संसद के भीतर लाने में उन्होंने भरपूर सहयोग दिया.

ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को पश्चिम बंगाल में भले ही पटखनी दे दी हो लेकिन उन्हें पता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता के शक्तिपुंज को प्रज्‍जवलित नहीं किया जा सकता. वे जानती हैं कि पिछले वर्षो में कांग्रेस नेतृत्वहीन हो गई है, जनता से दूर हो गई है लेकिन आज भी करीब 30 प्रतिशत मत कांग्रेस के पास है और गांवों से लेकर शहर तक कांग्रेस की जड़ें फैली हुई हैं. कांग्रेस यदि जाग गई तो राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदलने में वक्त नहीं लगेगा.

ममता बनर्जी को यह भी पता है कि उनका मुकाबला जिस भारतीय जनता पार्टी से है, वह पूरी तरह बदल चुकी है. यह अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेतृत्वकर्ताओं वाली भाजपा नहीं है. यह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा है. नरेंद्र मोदी ने  राजनीति में अपनी अलग संस्कृति बनाई. वे आज भाजपा के हाईकमान बन गए हैं. पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता बन गए हैं. 

भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी उनका विशेष स्थान बन गया है. मोदी जी हालांकि संघ परिवार से ही आते हैं लेकिन उनके सोचने और काम करने का अलग तरीका है. ऐसे नरेंद्र मोदी वाली भाजपा से राष्ट्रीय स्तर पर लड़ना है और पटखनी देना है तो भाजपा के विरोध में अलग-अलग खड़ी शक्तियों को एकजुट करना होगा. यह काम बिना कांग्रेस के नहीं हो सकता है. कांग्रेस के बगैर मोदी जी की गद्दी हिलाई नहीं जा सकती.

ममता बनर्जी के पास कैडर बेस्ड भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ढाई दशक पुरानी सरकार को उखाड़ फेंकने और दो दशक से ज्यादा समय तक सत्ता में टिके रहने का व्यापक अनुभव है. वे सड़क की नेता हैं. उन्हें सड़क पर उतरना आता है, डंडे खाने से वे भयभीत नहीं होतीं. एक निडर योद्धा की तरह वे हर मोर्चे पर खड़ी रहती हैं. निश्चित रूप से उनके भीतर आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा है कि यदि विपक्षी पार्टियां साथ आ जाएं तो भाजपा को केंद्र में पछाड़ा जा सकता है.

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ऐसे किसी गठबंधन के लिए तैयार है? यदि हां तो वह अपनी भूमिका को किस रूप में देखना चाहेगी? सवाल यह भी है कि यदि कांग्रेस साथ में आती है तो क्या कांग्रेस ममता बनर्जी या शरद पवार को नेता मानने को तैयार होगी? क्या अखिलेश यादव और दूसरे क्षेत्रीय नेता ममता के नाम पर मानेंगे?

सवाल बहुत से हैं. इन सवालों के जवाब ही भारतीय राजनीति की दिशा तय करेंगे. और  सबसे बड़ा सवाल ये है कि केवल ‘लोकतंत्र बचाओ, देश बचाओ’ के नारे से गठबंधन क्या मोदीजी से जीत पाएगा?

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