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शोभना जैन का ब्लॉग: भारत-अमेरिका संबंधों में क्षणिक ठहराव

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: July 27, 2019 07:57 IST

भारत और अमेरिका के संबंध पिछले कुछ समय से काफी मधुर चल रहे हैं, हालांकि द्विपक्षीय एजेंडे में फिलहाल कई और मुद्दे सुलझाए जाने बाकी हैं जिनमें जवाबी कार्रवाई बतौर भारत द्वारा अमेरिका के खिलाफ कुछ उत्पादों पर बढ़ाया गया टेरिफ, रूस के साथ एस 400 मिसाइल की खरीद से लेकर 5-जी और ईरान के साथ व्यापार जैसे अनेक मुद्दे हैं.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसी हफ्ते पाकिस्तान के प्रधानमंत्नी इमरान खान के साथ अमेरिका में हुई बहुचर्चित मुलाकात में जिस तरह से भारत के ‘परंपरागत रुख से उलट’ कश्मीर मसले के समाधान के लिए मध्यस्थता की पेशकश कर डाली और कहा कि प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने ओसाका में हुई जी-20 शिखर बैठक के दौरान उनके सम्मुख कश्मीर मसले को सुलझाने के लिए ‘तथाकथित’ मध्यस्थता करने का प्रस्ताव रखा था, उससे तय था कश्मीर पर ट्रम्प उवाच से भारत में राजनैतिक तूफान आएगा.

 ट्रम्प के सच या झूठ को लेकर कयास पूरे चरम पर हैं. भारत के विदेश मंत्नालय ने फौरन कहा कि ऐसी कोई पेशकश की ही नहीं गई, कश्मीर द्विपक्षीय मुद्दा है और इसमें तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है. अमेरिकी विदेश मंत्नालय ने भी सफाई देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर अमेरिकी रुख में कोई बदलाव नहीं है, यह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है. दोनों ही देशों के अधिकतर मीडिया ने भी कहा कि ट्रम्प ‘बड़बोले’ हैं और अपरिपक्वता से बिना सोचे समङो कुछ भी बोल देते हैं.

दरअसल सवाल यह नहीं है कि ट्रम्प ने सच बोला या झूठ. सवाल यह है कि ट्रम्प की यह टिप्पणी क्या उनकी डिप्लोमेटिक पैंतरेबाजी है, जिसके तार अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें हटाने को लेकर पाकिस्तान से फौरी मदद की दरकार से जुड़े हैं और यही वजह है कि इमरान खान से हुई मुलाकात में वे कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए तीसरे पक्ष का सहयोग लेने की पाकिस्तान की लाइन को ही आगे बढ़ा रहे थे. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आतंकी चरमपंथी समूह तालिबान के बीच गहरी साठगांठ जगजाहिर है. अमेरिका पाकिस्तान पर तालिबान की मदद करने के आरोप लगाता रहा है. ऐसे में जबकि पाकिस्तान की मदद की उन्हें फिलहाल फौरी दरकार है, तो यह टिप्पणी उसी संदर्भ में ही लगती है. दूसरी तरफ यह भी साफ है कि पाकिस्तान अफगान शांति प्रक्रिया से भारत को दूर रखना चाहता है.

अफगानिस्तान की बदलती हुई स्थितियां भारत के लिए खास तौर से चिंताजनक हैं. भारत का प्रयास यही है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें हटने के बाद वहां तालिबान आतंकी फिर से हावी न हो जाएं जो कि पूरी दुनिया के साथ खास तौर पर भारत के पड़ोस में शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकते हैं और पाकिस्तान इस स्थिति का फायदा भारत के खिलाफ आतंक भड़काने के लिए कर सकता है. इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद वहां स्थितियां खराब नहीं हों और अमेरिका भारत दोनों मिल कर वहां इस प्रक्रि या को कामयाबी से लागू करने के लिए काम करें. 

अगर देखें तो भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते कई ‘अनसुलङो मुद्दों’ के बावजूद अच्छे चल रहे हैं. इसीलिए अमेरिका के लिए पाकिस्तान व भारत, दोनों के ही साथ रिश्तों में संतुलन बनाना जरूरी है. इस घटनाक्रम से हालांकि भारत-अमेरिका रिश्तों में दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और भारत और अमेरिका दोनों ने ही इस स्थिति को ‘समझदारी’ से संभाला है लेकिन यह भी हकीकत है कि इस घटनाक्र म से दोनों पक्षों के बीच कुछ ठिठकन सी आई है. हालांकि वह क्षणिक ही लगती है. दोनों देश सामरिक साझीदारी सहित अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्नों में मिल कर काम कर रहे हैं.

भारत और अमेरिका के संबंध पिछले कुछ समय से काफी मधुर चल रहे हैं, हालांकि द्विपक्षीय एजेंडे में फिलहाल कई और मुद्दे सुलझाए जाने बाकी हैं जिनमें जवाबी कार्रवाई बतौर भारत द्वारा अमेरिका के खिलाफ कुछ उत्पादों पर बढ़ाया गया टेरिफ, रूस के साथ एस 400 मिसाइल की खरीद से लेकर 5-जी और ईरान के साथ व्यापार जैसे अनेक मुद्दे हैं. दोनों देशों के रिश्तों में आई इस क्षणिक ठिठकन के बाद रिश्तों के भावी स्वरूप को विदेश मंत्नालय के प्रवक्ता रवीश कुमार की इस टिप्पणी से समझा जा सकता है. इस पूरे मामले को लेकर उठे सवालों पर इस मुद्दे को और नहीं खींचने की गरज से प्रवक्ता ने कहा, ‘भारत अमेरिकी रिश्ते बहुआयामी हैं और  दोनों अनेक अहम मुद्दों पर आगे बढ़ रहे हैं. इस मुद्दे को छोड़ हमें अब आगे बढ़ना चाहिए.’ वैसे व्हाइट हाउस की ओर से ट्रम्प-इमरान मुलाकात के बाद जारी संयुक्त बयान में कश्मीर का कोई उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन ट्रम्प के इस तरह के बयान से सवाल उठना भी स्वाभाविक है. 

निश्चय ही निगाहें अब अगले माह फ्रांस में होने वाले जी-7 शिखर बैठक पर होंगी जहां पीएम मोदी और ट्रम्प दोनों ही हिस्सा लेंगे जहां दोनों के बीच मुलाकात की संभावना भी उभर रही है. एक तरफ जहां दोनों देश इस विवाद को एक तरफ छोड़  संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए आगे काम कर रहे हैं, वहीं जब दोनों शिखर नेता पहली बार रूबरू होंगे तो मुलाकात कैसी रहेगी, इस पर सबका  ध्यान रहेगा. 

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