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सारंग थत्ते का ब्लॉग: दुनिया के सभी देशों में रक्षा खर्च का लगातार बढ़ना चिंताजनक

By सारंग थत्ते | Updated: May 5, 2019 06:04 IST

हथियारों और सेना की ताकत को बढ़ाने में सभी बड़े देशों में एक दूसरे से आगे निकलने की जद्दोजहद ने इस पृथ्वी को इतना अधिक बारूद का ढेर दे दिया है जिससे यह धरती कई बार पूरी तरह से नष्ट हो सकती है.

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दुनिया की दूसरी बड़ी लड़ाई को समाप्त हुए तकरीबन 74 साल बीत चुके हैं, लेकिन विश्व के विभिन्न देशों में युद्ध जैसे हालात बरकरार हैं, खतरा बना हुआ है. पिछले तीन दशक में मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया में जिस तरह से हथियारों की होड़ में देशों ने अपना पैसा बहाया है, वह तीसरे विश्व युद्ध के बराबर ही आंका जा सकता है.

हथियारों और सेना की ताकत को बढ़ाने में सभी बड़े देशों में एक दूसरे से आगे निकलने की जद्दोजहद ने इस पृथ्वी को इतना अधिक बारूद का ढेर दे दिया है जिससे यह धरती कई बार पूरी तरह से नष्ट हो सकती है. अंतर्राष्ट्रीय संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट, की वार्षिक रिपोर्ट इसी मंगलवार को विश्व को देखने को मिली. एक बेहद जटिल जानकारी को जुटाने में कई वर्षो से यह संस्था कार्यरत है एवं इसकी रिपोर्ट में दी गई जानकारी पर कभी किसी देश ने आक्षेप नहीं किया है. हर वर्ष रक्षा खर्च के आंकड़ों का विश्लेषण कर विश्व का सही मायने में विस्तृत आकलन पेश करने में यह संस्था माहिर है.

सभी देशों में अग्रणी अमेरिका ने रक्षा खर्च में पिछले वर्ष 649 बिलियन डॉलर खर्च किए हैं. दूसरे स्थान पर चीन का दबदबा बरकरार है जिसने अपने रक्षा खर्च में 5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर 250 बिलियन डॉलर की सीमा को छुआ है. 1994 के मुकाबले चीन ने दस गुना ज्यादा खर्च किया है. चीनी प्रवक्ता ने इस पर अपनी टिप्पणी में कहा कि यह बढ़ोत्तरी चीन के आर्थिक विकास को दर्शाती है. चीन ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.9 प्रतिशत रक्षा व्यय किया है.

विश्व के सभी देशों को मिलाकर एकत्रित रक्षा खर्च में भी 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो 1.82 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच चुकी है. पिछले 30 वर्षो में सबसे ज्यादा रक्षा खर्च दर्ज हुआ है जो शीत युद्ध के बाद से 76 प्रतिशत ज्यादा है. इसमें से 60 प्रतिशत के हकदार हैं अमेरिका, चीन, भारत, सऊदी अरब और फ्रांस. दरअसल अमेरिका और चीन ने विश्व रक्षा खर्च का आधा हिस्सा अपने नाम किया है. पूरे विश्व ने 2018 में मिलकर 1822 बिलियन डॉलर का खर्च दर्ज किया है, जो 2017 के मुकाबले 2.6 प्रतिशत ज्यादा है. विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 2.1 प्रतिशत विश्व ने रक्षा पर खर्च किया है.

यहां एक तथ्य यह है कि सऊदी अरब ने सबसे ज्यादा अर्थात  जीडीपी का 8.8 प्रतिशत रक्षा पर खर्च कर डाला है. अमेरिका और चीन के बाद सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में सऊदी अरब, भारत और फ्रांस पहले पांच स्थानों में हैं. भारत ने विश्व में सर्वाधिक रक्षा सामान आयात करने का तमगा हासिल किया है. इस पर हमें गर्व करना चाहिए या नहीं, यह आप पर निर्भर है. इस समय देश के आसपास मंडराता खतरा और उससे निबटने के लिए जरूरी रक्षा साजोसामान, गोलाबारूद, मिसाइल, लड़ाकू जहाज, पनडुब्बियां, संचार के बेहतर विकल्प और तोपों की जरूरत पर सरकार ने पिछले वर्षो में खासा तवज्जो दिया है.  

बड़े सवाल उभर कर सामने आते हैं कि विश्व के कई देशों में सुरक्षा को लेकर असहज होने के सिवाय दूसरा चारा नहीं है. देशों को अपने आसपास खतरा मंडराता नजर आता है और उससे बचने के लिए अपने देश के रक्षा और सुरक्षा खर्च में हर साल बढ़ोत्तरी होती रही है. मानवता के लिए इस किस्म का खर्च जबरन हो रहा है.

देशों को मिल बैठकर अब सोचना होगा कि इतने हथियार और सेना में क्या कटौती हो सकती है? देशों की जीडीपी का कम से कम हिस्सा सुरक्षा पर खर्च हो, यह तय होना जरूरी है. आने वाले दिनों में महंगाई की मार जबरदस्त रूप से पूरी दुनिया के छोटे देशों के बजट को बिगाड़ सकती है. यह भी सोचना होगा कि असली दुश्मन के न होते हुए भी विश्व के देशों को अपनी सेनाओं को हथियारों से लैस करने के लिए हर बजट में एक बढ़ी हुई राशि देनी पड़ रही है. क्या यह वाकई में जरूरी है?  

टॅग्स :इंडियाभारतीय सेनाइंडियन एयर फोर्सअमेरिका
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