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डॉ. खुशालचंद बाहेती: कार्रवाई के पहले पुलिस को करनी चाहिए पूरी तहकीकात

By डॉ खुशालचंद बाहेती | Updated: April 4, 2022 12:51 IST

अगर माना जाए कि कार्रवाई राजनीतिक निर्देश पर की जाती है, तब भी केंद्रीय एजेंसियां चुपचाप अपना होमवर्क करती हैं और सबूत मिलने के बाद ही कार्रवाई करती हैं.

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राज्य पुलिस राजनीतिक बदले के आरोप वाले कई मामलों में अदालत के सामने टिक नहीं पा रही है. मुंबई पुलिस की तुलना स्कॉटलैंड यार्ड से की जाती रही है. राज्य पुलिस बल देश में अव्वल नंबर पर था; लेकिन अब कहां है?

अर्णब गोस्वामी मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि बकाया राशि का भुगतान नहीं करना आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध कैसे हो सकता है. सुप्रीम कोर्टद्वारा यह कहने के बावजूद कि एक ही घटना के लिए कई जगहों पर अपराधों की रिपोर्ट दर्ज करना गलत है, कोई फर्क नहीं पड़ा है.

अनिल देशमुख के खिलाफ अपराध गलत होने की बात को कोर्ट स्वीकार नहीं कर सका. उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों को विश्वास नहीं था कि राज्य पुलिस इसकी जांच कर सकती है.

रश्मि शुक्ला के खिलाफ दर्ज मामले में सीबीआई निदेशक सुबोध कुमार जायसवाल आरोपी हो सकते हैं, पुलिस की इस भूमिका पर उच्च न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की थी. दिशा सालियान मामले में मुंबई पुलिस ने केंद्रीय मंत्री नारायण राणो से दस घंटे तक पूछताछ की. इसी मामले में अग्रिम जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि उसे समझ में नहीं आता कि धारा 509 (महिला को शर्मिदा करने वाला कृत्य), 506 (धमकी) आईपीसी और 37 प्रौद्योगिकी अधिनियम कैसे लागू होते हैं. यदि इन धाराओं को हटा दिया जाता है, तो अपराध के अन्य खंड अदखलपात्र हैं. फिर भी पुलिस की जांच जारी है.

परमवीर सिंह की सुप्रीम कोर्ट में याचिका इस आधार पर थी कि राज्य पुलिस जानबूझकर उनके खिलाफ झूठे मामले दर्ज कर रही है. शीर्ष अदालत ने मामले को राज्य पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दिया. साथ ही यह कहकर कि अगर उनके खिलाफ कोई और मामला दर्ज हो तो सीबीआई ही उसकी भी जांच करेगी, अदालत ने एक प्रकार से उनकी बात को सही ही माना.

राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं ने अब अदालतों को भी केंद्रीय एजेंसियों की श्रेणी में रखकर उनके खिलाफ भी आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं. जबकि इसके पीछे असली वजह यह है कि पुलिस अदालतों में मामलों के टिके रहने लायक सबूत ही नहीं दे पा रही है.

अदालत में मामलों का न टिकना पुलिस की नाकामी है. इससे बचने के लिए और देश में नंबर एक पुलिस बल के रूप में राज्य पुलिस की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए, पुलिस द्वारा अपना होमवर्क पूरा करने का केंद्रीय एजेंसियों का गुण निश्चित रूप से अपनाना चाहिए. इसके अलावा जिन मामलों में कार्रवाई संभव न हो वहां कानून का हवाला देकर दबाव को नकार देना चाहिए. पुलिस के शीर्ष नेतृत्व को इसकी जिम्मेदारी लेने का समय आ गया है.

यह स्पष्ट है कि केंद्रीय जांच एजेंसी कोई भी कार्रवाई करने से पहले पूरा होमवर्क करती है. कुछ पुख्ता सबूत हाथ में लेकर ही वे कार्रवाई करते हैं. इसलिए उनके मामले कोर्ट में टिकते हैं. दो मंत्रियों को जमानत नहीं मिली. रिमांड देते समय अदालत ने कहा कि अपराध के प्रथम दृष्टया सबूत हैं, ईडी द्वारा संपत्ति जब्त करने को अदालत से मान्यता मिली. आयकर विभाग की छापेमारी में करोड़ों की संपत्ति की कर चोरी और वित्तीय लेनदेन का खुलासा हुआ है.

अगर माना जाए कि कार्रवाई राजनीतिक निर्देश पर की जाती है, तब भी केंद्रीय एजेंसियां चुपचाप अपना होमवर्क करती हैं और सबूत मिलने के बाद ही कार्रवाई करती हैं. सीबीआई ने सुशांत सिंह राजपूत मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया है, जिसका अर्थ है कि उसे अभी तक सबूत नहीं मिले हैं और इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की गई है. राज्य पुलिस को भी कार्रवाई के पहले अपना होमवर्क पूर्ण करने की कला सीखनी चाहिए.

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