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पीयूष पांडे का ब्लॉग: सीएम उद्धव ठाकरे से इस्तीफा लेने-देने का रोमांचकारी तमाशा

By पीयूष पाण्डेय | Updated: April 4, 2021 13:40 IST

कर्नाटक में ग्रामीण विकास मंत्री ईश्वरप्पा ने अपने विभाग के मामले में मुख्यमंत्री पर हस्तक्षेप करने और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो विरोधी येदियुरप्पा का इस्तीफा मांग रहे हैं.

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महाराष्ट्र में कोरोना का प्रकोप बढ़ रहा है तो विरोधी मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से इस्तीफा मांग रहे हैं. एक ‘विस्फोटक’ पुलिसवाले ने महाराष्ट्र सरकार की फजीहत कराई तो विरोधी गृह मंत्री का इस्तीफा मांगने लगे.

कर्नाटक में ग्रामीण विकास मंत्री ईश्वरप्पा ने अपने विभाग के मामले में मुख्यमंत्री पर हस्तक्षेप करने और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तो विरोधी येदियुरप्पा का इस्तीफा मांग रहे हैं. इससे पहले, पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीं और किसान आंदोलन ने जोर पकड़ा तो विरोध करने वालों ने प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग लिया.

दरअसल, इस्तीफा वो चीज है, जिसे मांगते सब हैं, देता कोई नहीं. वैसे, इस्तीफा कई वजह से दिया भी जा सकता है. एक इस्तीफा वो होता है, जो टिकट न मिलने पर दिया जाता है. दूसरा, पद न मिलने पर दिया जाता है. तीसरा, जो नेता देता है, लेकिन देना नहीं चाहता. चौथा वो, जो पार्टी लेती तो है, लेकिन लेना नहीं चाहती.

पांचवां, जो कार्यकर्ताओं के दबाव में देना पड़ता है. छठा, जो पार्टी में कथित अपमान महसूस होने के चलते देना पड़ता है. सातवां, जो पार्टी में नियमित बेइज्जती होने की वजह से देना पड़ता है. आठवां, जब न कार्यकर्ता लोड लें, न आलाकमान तो देना पड़ता है.

नौवां, पार्टी जब कॉमेडी शो अर्थात ठेके लेने-देने के अलावा किसी काम से पैसा कमाने पर पाबंदी लगाए तो देना पड़ता है. दसवां, पार्टी में कोई काम न हो या कोई काम न दिया जाए और बंदा फालतू बैठा हो तो वो इस्तीफा देता है.

आरोप लगने के बाद बड़े नेता अमूमन इस्तीफा नहीं देते. कुंडली में नौ ग्रह आठवें भाव में हों और चार चैनल विरोध में कुंडली मारकर बैठें तभी नेता का ‘इस्तीफा योग’ बनता है. बड़े नेता का इस्तीफा एक फिल्म की तरह होता है. न्यूज चैनलों के लिए तो ऐसे इस्तीफे महापर्व की तरह होते हैं. एक बड़े इस्तीफे से चार-छह ठंडे दिन गर्म हो जाते हैं.

टीआरपी की बरसात होती है. इस्तीफे की वजह की चीर-फाड़ होती है. चंद्रयान जाते वक्त जो एक्सपर्ट मौसम वैज्ञानिक था, वो अचानक राजनीति का एक्सपर्ट हो लेता है. इस्तीफे की ऐसी-ऐसी थ्योरी गढ़ी जाती हैं कि इस्तीफा देने वाला कई बार चकरायमान स्थिति में आ लेता है.

दर्शक भी इस्तीफे वाली फिल्म में डूब जाते हैं. नैतिकता नाम की चिड़िया राजनीति के आकाश से उसी तरह कब की गायब हो चुकी है, जिस तरह बड़े शहरों के फ्लैट से गौरैया गायब हो चुकी है.

गौरैया को बचाने की तो छोटी-मोटी कोशिशें हो भी रही हैं, लेकिन नैतिकता को बचाने की कोई कोशिश कहीं नहीं हो रही. न समाज में, न राजनीति में. इसलिए इस्तीफे को नैतिकता के चश्मे से कोई नहीं देखता.

बहरहाल, बहुत दिनों से कोई रोमांचकारी इस्तीफा नहीं हुआ तो मजा नहीं आ रहा. क्या कहते हैं आप?

टॅग्स :महाराष्ट्रउद्धव ठाकरे
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