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पंकज चतुर्वेदी का ब्लॉग: अकेले पाठ्यपुस्तकों से नहीं सीखता बच्चा

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: October 29, 2020 15:43 IST

बच्चे की रूचि पढ़ाई में बने, वो इसका आनंद उठाए और उसे समझ सके, इसके लिए सबसे पहले नीरस पुस्तकों को बदलना होगा. स्थानीय परिवेश, पाठक बच्चों की पृष्ठभूमि आदि को ध्यान रख कर सकारात्मक सामग्री भी रखना जरूरी है.

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ठळक मुद्देकक्षा 10 के आते-आते 40 प्रतिशत बच्चे शिक्षा छोड़ देते हैं, कारणों की पहचान है जरूरीनीरस पुस्तकों को बदलने की जरूरत, साठ फीसदी चित्र हों, ऐसी पुस्तकें बच्चों के बीच डाली जाएं

चार साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार देश की राजधानी में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 75 फीसदी बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तक को ठीक से पढ़ नहीं पाते थे. पढ़ नहीं पाते हैं तो समझ नहीं पाते और समझ नहीं पाते तो उस पर अमल नहीं कर पाते. शायद यही कारण है कि कक्षा 10 के आते-आते इनमें से 40 प्रतिशत शिक्षा छोड़ देते हैं.

स्कूल में भाषा-शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण व पढ़ाई का आधार होती है. प्रतिदिन के कार्य बगैर भाषा के सुचारू रूप से कर पाना संभव ही नहीं होता. व्यक्तित्व के विकास में भाषा एक कुंजी है, अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना हो या फिर दूसरों की बात ग्रहण करना, भाषा के ज्ञान के बगैर संभव नहीं है. 

भाषा का सीधा संबंध जीवन से है और मात्र भाषा ही बच्चे को परिवार, समाज से जोड़ती है. भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बालक को सोचने-विचारने की क्षमता प्रदान करना, उस सोच को निरंतर आगे बढ़ाए रखना, सोच को सरल रूप में अभिव्यक्त करने का मार्ग तलाशना होता है. 

अब जरा देखें कि मालवी व राजस्थानी की कई बोलियों में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है और बच्चा अपने घर में वही सुनता है, लेकिन जब वह स्कूल में शिक्षक या अपनी पाठ्यपुस्तक पढ़ता है तो उससे संदेश मिलता है कि उसके माता-पिता ‘गलत’ उच्चारण करते हैं. बस्तर की ही नहीं, सभी जनजातियां बोलियों में हिंदी के स्वर-व्यंजन में से एक चौथाई होते ही नहीं हैं. 

असल में आदिवासी कम में काम चलाना तथा संचय ना करने के नैसर्गिक गुणों के साथ जीवनयापन करते हैं और यही उनकी बोली में भी होता है.

बच्चा ठीक से पढ़ सके, उसका आनंद उठाए और उसे समझ सके, इसके लिए सबसे पहले तो नीरस पुस्तकों को बदलना होगा. 12 या 16 पेज की रंग-बिरंगी छोटी कहानी वाली, जिसमें साठ फीसदी चित्र हों, ऐसी पुस्तकें बच्चों के बीच डाली जाएं, इस उम्मीद के साथ कि इसकी कोई परीक्षा नहीं होगी. उसके बाद पाठ्यपुस्तक हो, जिसमें स्थानीय परिवेश, पाठक बच्चों की पृष्ठभूमि आदि को ध्यान रख कर सकारात्मक सामग्री हो. 

चित्र की अपनी भाषा होती है और रंग का अपना आकर्षण, मनोरंजक कहानियों व चित्रों की मदद से बच्चे बहुत से शब्द चीन्हने लगते हैं और वे उनका इस्तेमाल सहजता से अपनी पाठ्यपुस्तक में भी करने लगते हैं

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