भारत माता की स्वतंत्रता के साधक मूर्धन्य कवि, निबंधकार, कथाकार, पत्रकार, सम्पादक और सेनानी. जी हां, स्मृतिशेष माखनलाल चतुर्वेदी ( जिनकी आज जयंती है) का व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था कि इतना सब कहने के बावजूद तब तक पूरा नहीं होता, जब तक उनकी ‘एक भारतीय आत्मा’ का जिक्र न किया जाए.
दरअसल, यह उनका उत्कट देश प्रेम ही था, जिसने उनकी रचनाओं को मातृभूमि के प्रति समर्पण, त्याग व बलिदान की उदात्त भावनाओं से भरा और उसकी सांस्कृतिक चेतना, ओज व तेज का सबसे प्रखर व लोकप्रिय गायक और साथ ही हिंदी साहित्य के नव-स्वच्छंदतावाद आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक बनाया. दूसरे शब्दों में इस बात को इस तरह भी कहा जा सकता है कि छायावाद की प्रकृति व प्रेम की सीमाओं को तोड़कर वे उसे देशानुराग, राष्ट्रीयता व रहस्यवाद की नई ऊंचाइयों तक ले गए.
देश, समाज और साहित्य की उनकी अतुलनीय सेवाओं के मद्देनजर यह स्वाभाविक ही था कि आजादी के बाद 1953 में साहित्य अकादमी की स्थापना हुई तो 1955 में वे उसका पहला पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले हिंदी साहित्यकार बने. यह पुरस्कार उन्हें उनकी बहुचर्चित कृति ‘हिमतरंगिणी’ के लिए दिया गया था.
इसके अलावा उनकी हिम तरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, बीजुरी काजल आँज रही आदि काव्य कृतियों ने भी भरपूर प्रशंसाएं बटोरीं. लेकिन उनकी अमर कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ को इन सबसे ऊपर बताया जाता है.
उनकी सृजनात्मक यात्रा के मुख्य रूप से तीन आयाम थे- एक, पत्रकारिता और संपादन, दूसरा साहित्य सेवा और तीसरा स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी. उन्होंने अपने व्याख्यानों में तत्कालीन सामाजिक, साहित्यिक व राजनीतिक प्रश्नों से दो-चार होते हुए उनके माध्यम से राष्ट्रीय चेतना तो जगाई ही, अपने द्वारा सम्पादित ‘प्रभा’ व ‘कर्मवीर’ जैसी पत्रिकाओं को भी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ अभियानों का समर्थक बनाया.