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ब्लॉग: जेडीएस की हार ने भी कर्नाटक में निभाई कांग्रेस की जीत में भूमिका

By राजकुमार सिंह | Updated: May 22, 2023 09:53 IST

जद (एस) के मतों में चार प्रतिशत की गिरावट आई. इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला. जद (एस) का मत प्रतिशत घटते-घटते 13.29 रह गया है.

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कर्नाटक की राजनीति में अरसे से किंगमेकर की भूमिका के लिए चर्चित जनता दल (सेक्युलर) यानी जद (एस) ने काम तो इस बार भी वही किया, पर अनचाहे और अप्रत्यक्ष रूप से. गौरतलब है कि भाजपा ने अपना लगभग 36 प्रतिशत वोट शेयर बरकरार रखा है, उसके बावजूद कांग्रेस का मत प्रतिशत और सीटें इतनी बढ़ीं कि वह अपने बूते सत्ता पर काबिज हो गई. कांग्रेस को लगभग छह प्रतिशत ज्यादा मत मिले हैं तो उसमें सर्वाधिक 73.19 प्रतिशत मतदान के अलावा जद (एस) के मतों में चार प्रतिशत की गिरावट की भी अहम भूमिका है. 

जद (एस) का मत प्रतिशत घटते-घटते 13.29 रह गया है. 2018 के चुनावों में 104 सीटों के साथ 224 सदस्यीय विधानसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा इस बार मात्र 66 सीटों पर सिमट गई. जबकि पिछली विधानसभा में 80 सीटें जीतनेवाली कांग्रेस 135 पर पहुंच गई तो 37 सीटोंवाला जद (एस) 19 सीटों पर सिमट गया.

उम्मीद से भी ज्यादा चौंकानेवाला यह फैसला तब आया, जबकि येदियुरप्पा की बिना बहुमत की सरकार गिरने के बाद जद (एस) और कांग्रेस ने एच.डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व में लगभग साल भर सरकार चलाई. फिर जोड़-तोड़ से बना कर येदियुरप्पा ने पूरे दो साल सरकार चलाई और उसके बाद भाजपा ने उनका ताज बसवराज बोम्मई को पहना दिया. इस घटनाक्रम की चर्चा इसलिए कि इससे हालिया जनादेश के मर्म को समझने में मदद मिलती है. 

बेशक पिछली बार भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी. पर जरूरी समर्थन जुटाए बिना मुख्यमंत्री पद की शपथ ले लेना तो जनादेश की अवहेलना ही थी. स्वाभाविक ही येदियुरप्पा की सत्ता से बेआबरू विदाई हुई, लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ, उससे भी लोकतंत्र का मान हरगिज नहीं बढ़ा. भाजपा की नाकामी के बाद स्वाभाविक ही था कि दूसरा और तीसरा बड़ा दल यानी क्रमश: कांग्रेस और जद (एस) मिल कर सरकार बनाते. 

नैतिकता का तकाजा था कि कांग्रेस उसका नेतृत्व करती, पर जद (एस) की मुख्यमंत्री पद की सौदेबाजी से फिर साबित हो गया कि उसकी एकमात्र विचारधारा सत्ता ही है और अंध भाजपा विरोध में कांग्रेस उसके लिए मान भी गई. जब सारा खेल ही सत्ता का है तो फिर केंद्र समेत अधिकांश राज्यों में सत्तासीन भाजपा कर्नाटक में हर हाल में फिर अपनी सरकार बनाने का एकमात्र लक्ष्य कैसे नहीं साधती?

यह ठीक है कि जनादेश देने के बाद अगले चुनाव तक के लिए मतदाताओं की भूमिका खास नहीं रह जाती, पर वे प्रत्यक्षदर्शी तो सारे खेल के रहते ही हैं- और जब भी मौका मिलता है, आईना दिखाने से नहीं चूकते. कर्नाटक का हालिया जनादेश नई सरकार के लिए तो है ही, राजनीतिक दलों के लिए सबक भी है कि लोकतंत्र कुर्सी का खेल भर नहीं है. 

टॅग्स :कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023एचडी कुमारस्वामीकांग्रेसभारतीय जनता पार्टी
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