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ब्लॉग: सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का दोष केवल मोदी सरकार पर क्यों? कांग्रेस का इतिहास भी देख लीजिए

By हरीश गुप्ता | Updated: October 21, 2021 08:49 IST

पी. चिदंबरम से पूछा जा सकता है कि अब जब नरेंद्र मोदी सार्वजनिक उपक्रमों को बेच रहे हैं तो वे इसमें एक षड्यंत्रकारी प्रक्रिया क्यों देखते हैं.

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ऐसे समय में जबकि भारत से कोरोना लगभग विदा होने के करीब है, मोदी सरकार इस वित्तीय वर्ष में 1.75 लाख करोड़ रुपए जुटाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की बिक्री की तैयारियों में लगी है. 

यह पिछले वित्त वर्ष में केवल 32845 करोड़ रु. ही जुटा पाई थी. लेकिन जिस तरह से मोदी ने एयर इंडिया को टाटा को बेचा, उससे पिछले साल की देरी की भरपाई करने के सरकार के दृढ़ संकल्प का पता चलता है. 

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम भले ही यह कहते हुए अंधेरे में तीर चला रहे हों कि ‘‘प्रक्रिया (विनिवेश की) उस षड्यंत्रपूर्ण तरीके को दर्शाती है जिससे मोदी सरकार संचालित होती है.’’ लेकिन वे यह समझाने में विफल रहे कि कैसे मुनाफे में रहने वाली एयर इंडिया यूपीए सरकार के शासनकाल में घाटे के उद्यम में बदल गई. 

दूसरी बात, मोदी विनिवेश शब्द के ‘जनक’ नहीं हैं. इसका श्रेय 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव को जाता है, जिन्होंने वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और स्वतंत्र प्रभार वाले वाणिज्य राज्य मंत्री पी. चिदंबरम के साथ इसकी प्रक्रिया शुरू की थी. यह रिकॉर्ड में दर्ज है कि 1991-96 के बीच 31 सार्वजनिक उपक्रमों को महज 3038 करोड़ रु. में बेच दिया गया था. 

ये बहुमूल्य उपक्रम नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, मोरारजी और राजीव गांधी की सरकारों द्वारा आजादी के पहले 44 वर्षो में लोगों को बाजार की ताकतों से बचाने के लिए स्थापित किए गए थे. लेकिन 1991 के बाद से सरकारों ने लगातार न केवल नीति को उलट दिया बल्कि उन्हें उसी बाजार की ताकतों के हाथों वापस सौंप दिया.

वाजपेयी सरकार ने दिसंबर 1999 में एक अलग विनिवेश विभाग बनाकर इसे एक कदम आगे बढ़ाया और स्वर्गीय अरुण जेटली इसके पहले मंत्री बने जिन्होंने हिंदुस्तान लीवर को मॉडर्न फूड्स (दिल्ली मिल्क स्कीम सहित) बेचा. प्रारंभ में, विनिवेश आईओसी, बीपीसीएल, एचपीसीएल, गेल और वीएसएनएल जैसी बड़ी ब्लू चिप कंपनियों में शेयरों की बिक्री तक सीमित था. 

बाद में बाल्को, हिंदुस्तान जिंक, सीएमसी, सेंटोर और आईटीडीसी के प्रीमियम होटल, आईपीसीएल, मारुति-सुजुकी इंडिया और अन्य बेशकीमती कंपनियों को बेच डाला गया. फिर प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री के रूप में चिदंबरम का युग आया, जिन्होंने यूपीए के दस वर्षो के शासन के दौरान एक के बाद एक पीएसयू को बेचने की काफी कोशिश की. इस लेखक द्वारा विभिन्न आधिकारिक स्नेतों से एकत्र किए गए डाटा से पता चलता है कि 107879 करोड़ रुपए तब मुनाफा कमाने वाले सार्वजनिक उपक्रमों और शेयरों को बेचकर अर्जित किए गए थे. चिदंबरम से पूछा जा सकता है कि अब जब मोदी सार्वजनिक उपक्रमों को बेच रहे हैं तो वे इसमें एक षड्यंत्रकारी प्रक्रिया क्यों देखते हैं. वे भूल जाते हैं कि अपने समय में वे खुद नॉर्थ ब्लॉक में ऐसा करने में सबसे आगे थे.

कर्ता-धर्ता मोदी

मोदी अलग हैं क्योंकि वे महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करते हैं, उन्हें समय पर हासिल करने की कोशिश करते हैं और पूरा श्रेय खुद लेना पसंद करते हैं. चिदंबरम की चिंता यह है कि पूर्ण बहुमत वाली सरकार आने वाले सालों में विनिवेश के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी.

वे जानते हैं कि 1991 से 2014 के बीच लगातार पांच प्रधानमंत्रियों की 23 साल की अवधि के दौरान सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री के माध्यम से सिर्फ 152781 करोड़ रु. ही मिल सके थे. लेकिन मोदी ने अपने सात वर्षो के शासन (2014-2021) के दौरान ही 3.61 लाख करोड़ रु. जुटा लिए हैं, जो 23 वर्षो में एकत्र की गई राशि के दोगुने से भी अधिक है.

मोदी सरकार के अंदरूनी सूत्रों ने इस लेखक को बताया कि अगले दो वर्षो के दौरान अप्रत्याशित लाभ देखने को मिलेगा और 5 लाख करोड़ रु. अतिरिक्त इकट्ठा हो सकते हैं. अर्थव्यवस्था में तेजी के संकेत दिख रहे हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयर आसमान छू रहे हैं. 

पीएम मोदी कुल 336 केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में से रणनीतिक क्षेत्र के 35 सहित 100 बीमार सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने के लिए निकाल सकते हैं. मोदी न केवल बेच रहे हैं बल्कि बीएसएनएल और एमटीएनएल जैसी कुछ बीमार इकाइयों को लगभग एक लाख करोड़ रु. खर्च करके पुनर्जीवित कर रहे हैं. 

विडंबना यह है कि जब देश 5जी की ओर बढ़ रहा है, बीएसएनएल ने अब अपनी 4जी सेवाएं शुरू की हैं. कर्मचारियों को बड़ी संख्या में वीआरएस दिए जाने के बाद, दो दूरसंचार सार्वजनिक उपक्रम अब अच्छी हालत में हैं. मोदी ने 41 आयुध निर्माणी बोर्डो (ओएफबी) को भंग करने के बाद उन्हें व्यवहार्य बनाने के लिए सात नए पीएसयू भी बनाए हैं. उन्हें इसरो और डीआरडीओ की तरह विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी और अनुसंधान के नाम पर वे केवल सब्सिडी पर जीवित नहीं रह सकते.

अडानी, अंबानी के अपने-अपने इरादे

एक समय था जब अंबानी पीएसयू खरीदने में सबसे आगे थे और अदानी परिदृश्य में कहीं नहीं थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब अंबानी परिदृश्य से हट गए हैं और कोई भी सार्वजनिक उपक्रम खरीदना नहीं चाहते हैं, जबकि अदानी अपने रास्ते में आने वाली हर चीज खरीद रहे हैं; चाहे यह बिजली संयंत्र हो, बंदरगाह हो, हवाई अड्डे हों या सौर और पवन संयंत्र हों, यहां तक कि वे दूरसंचार क्षेत्र में भी प्रवेश कर सकते हैं. 

कम से कम 35 सार्वजनिक उपक्रम बिक्री के लिए तैयार हैं और कई और अगले वित्त वर्ष की सूची में जोड़े जा सकते हैं. मौसम अदानी के अनुकूल है.

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