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सेपियंस से इनसान की प्रवृत्ति समझाते हरारी, सांकृत्यायन और नेहरू

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: November 11, 2025 05:29 IST

युवाल नूह हरारी की ‘सेपियंस : ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमन काइंड’ फिलहाल दुनिया की सबसे लोकप्रिय तथ्यज यानी नॉन फिक्शन किताबों में है.

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ठळक मुद्देमार्वल स्टूडियो ने मल्टीवर्स के रूप में खूब भुनाया है.दिलचस्प है कि वह ‘कल्पज’ यानी कथा साहित्य जैसी हो गई है.मानवीय प्रजातियों से इतना आगे कैसे निकल गए कि कालांतर में सिर्फ वही बचे.

सुनील सोनी

जेरोम बिक्सबी ने साठ के दशक में एक लघु विज्ञानगल्प लिखनी शुरू की. शीर्षक था ‘द मैन फ्रॉम अर्थ’ जो 1998 में तब पूरी हुई, जब वे मृत्युशैया पर थे और बेटे इमरसन को बोल-बोलकर लिखवा रहे थे. नौ साल बाद इमरसन ने रिचर्ड शेंकमैन के निर्देशन में इसी नाम से फिल्म बनाई. एक कमरे में कुछ लोगों के संवादों पर चलनेवाली यह फिल्म खासी दिलचस्प थी, क्योंकि उसके प्रौढ़ नायक की आयु 14000 साल है, जिसे वह छिपाने के ठिकाने और नाम-काम बदलता रहता है. बिक्सबी ने दुनियाभर में मशहूर टीवी धारावाहिक ‘स्टारट्रैक’ के तीसरे सीजन के चार एपिसोड लिखे, जिसमें से 1969 में प्रसारित ‘रेक्विम फॉर मैथुसालाह’ का 6000 वर्ष से जिंदा नायक फ्लिंट अमर है. बिक्सबी ने ही 1967 के एपिसोड ‘मिरर मिरर’ में समानांतर ब्रह्मांड की कल्पना की थी, जिसे मार्वल स्टूडियो ने मल्टीवर्स के रूप में खूब भुनाया है.

बिक्सबी की गल्प की खूबियां इनसानी उत्कंठा से निकली हैं, जो अतीत में जाकर भविष्य के रहस्य तलाशना चाहता है. युवाल नूह हरारी की ‘सेपियंस : ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमन काइंड’ फिलहाल दुनिया की सबसे लोकप्रिय तथ्यज यानी नॉन फिक्शन किताबों में है. किसी किताब की हिंदी-मराठी समेत 65 भाषाओं में अनुवाद के साथ 4.5 करोड़ प्रतियां बिकना यह बताता है कि तथ्यज होने के बावजूद कहने का ढंग इतना दिलचस्प है कि वह ‘कल्पज’ यानी कथा साहित्य जैसी हो गई है.

‘सेपियंस’ पाषाण से आधुनिक युग की यात्रा ऐसे करवाती है, पर इतिहास के अनुसंधान के बजाय विचार तथा उसकी दर्शनात्मक व्याख्या पर काम करती है कि महज भाषा सीखने से होमो सेपियंस उनकी तत्कालीन समकक्ष मानवीय प्रजातियों से इतना आगे कैसे निकल गए कि कालांतर में सिर्फ वही बचे.

भाषा ने उन्हें शिकारियों से कृषक बना दिया, देहाती-शहराती बनाया; धन, धर्म, जाति, समुदाय, राष्ट्र जैसे ‘कोड’ बनाए और कल्पना को विज्ञान के जरिये वास्तविकता बनाया. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में इतिहास-लेखन में प्रशिक्षित हरारी मूलत: इतिहासकार हैं, नृतत्वशास्त्र, पुरातत्व, आनुवंशिकी, जीवाश्म विज्ञान के शोधकर्ता नहीं हैं.

सेपियंस में मौजूदा वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अध्ययनों के तथ्यों को बृहद कथा में गूंथकर वे मानव सभ्यता के विकास धर्म व धन की अवधारणाएं से बताते हैं कि आधुनिक मनुष्य की यात्रा किस कदर रोमांचकारी है. यही वजह है कि वैज्ञानिक समुदाय और इतिहासकार उसे पाठ्‌यपुस्तक के बजाय तथ्यज-कथा साहित्य कहना पसंद करते हैं.

‘सेपियंस’ आम पाठक को जटिल वैज्ञानिक बहसों से आसानी ढंग से परिचित कराती है, लेकिन तथ्य और विचार की सीमा को कई बार धुंधला देती है. वह ज्ञान नहीं अतीत देखने की दृष्टि देती है, पर यह नहीं बताती कि ऐसा ही घटा था और है. ऐसा लगता है यह सिनेमा जैसी कथा है, जो नायकीय निष्कर्ष पर पहुंचाती है, पर उसकी विविधता को नजरअंदाज करती है.

मसलन, होमो सेपियंस का अन्य मानव प्रजातियों को पछाड़ने को संयोग (भाग्य) होने का संकेत देना. कोई शक नहीं कि हरारी की किताबों ने मानवीय इतिहास और भविष्य की कल्पना को दिलचस्प बयान दिया है, जिन्होंने सातों महाद्वीपों के लोगों की आसपास हो रहे पुराकार्यों में दिलचस्पी जगाई है. लेकिन, कुछ और किताबें भी पढ़ी जा सकती हैं, जो भरोसेमंद स्रोतों से लिखी गई लोकप्रिय विज्ञान किताबें हैं.

ये सब मानव उत्पत्ति और विकास की समझ बढ़ाने में उपयोगी हो सकती हैं. इनमें डीन फॉक की इसी साल आई ‘द बोटैनिक एज’, 2023 में आई सर्गियो एल्मेशिया की ‘ह्यूमंस’, 2022 की जेनिफर राफ की ‘ओरिजिन’, दिमित्रा पैपागिनी व माइकल ए. मोर्स की ‘द निएंडरथल्स रिडिस्कवर’ और डेब्रा बर्सकी की ‘ह्यूमन प्री हिस्ट्री’ शामिल हैं.

वैसे ‘कल्पज’ में 20वीं सदी की शुरुआत में एच.जी. वेल्स की ‘मनुष्य का इतिहास’ और हेंड्रिक विलेम वॉन लून की 1920 में ‘मानव की कहानी’ पढ़ना भी दिलचस्प है. भारत में पिछली सदी में हिंदी मेंं व्यापक अध्ययन और यात्रा के साथ राहुल सांकृत्यायन ने मानव जाति और सभ्यता के विकास को सबसे व्यापक, जिज्ञासु और वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की कोशिश की.

उन्होंने मनुष्य कहां से आया? चेतना और समाज कैसे विकसित हुए? सभ्यता के मूल तत्व क्या हैं? जैसे सवालों को पुस्तकाकार लिखा. प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक मनुष्य की यात्रा को पाषाण युग, धातु युग, कृषि विकास, राज्य व धर्म के उदय, औद्योगिक समाज, समाजवादी युग तक का सांस्कृतिक तथ्यज साहित्य ‘कल्पज’ जैसे लिखा.

‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में वे भारतीय और विश्व दर्शन की ऐतिहासिक समीक्षा से बताते हैं कि कैसे धार्मिक मिथक धीरे-धीरे वैज्ञानिक और भौतिकवादी दृष्टिकोण में बदलते हैं. यह भी कि धर्म और दर्शन, दोनों ही मानव समाज की सामाजिक-आर्थिक संरचना से उपजते हैं.  यही बात पं. जवाहरलाल नेहरू की ‘भारत एक खोज’ में है, जो भारतीय व विश्व सभ्यता के विकास की दार्शनिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से विचारशील व्याख्या करती है.  

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