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डॉ. विजय दर्डा का ब्लॉग: आओ फिर से दिया जलाएं...!

By विजय दर्डा | Updated: November 11, 2023 10:09 IST

इस दिवाली बस इतनी सी गुजारिश है कि हम सब मिलकर जाति, पंथ और धर्म की काली विषमताओं को मनुष्यता के दीपक से उज्‍जवल कर दें। आप सभी को दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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ठळक मुद्देदिवाली खुशियों का त्यौहार है हमें दूसरों के लिए खुद को दीपक भी बनाना चाहिए जरूरत पड़े तो खुद की आहुति भी देनी होगी

भरी दुपहरी में अंधियारासूरज परछाईं से हाराअंतरतम का नेह निचोड़ें,बुझी हुई बाती सुलगाएंआओ फिर से दिया जलाएं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता आपने भी पढ़ी होगी या कभी सुनी भी होगी लेकिन मैं खुशनसीब हूं कि मुझे यह कविता अटलजी से आमने-सामने सुनने का सौभाग्य मिला। मैंने उनसे पूछा था कि फिर से दिया जलाएं का आशय क्या है? उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में मेरी ओर देखा और इसी कविता की आगे की पंक्तियां फिर से सुना दीं।

हम पड़ाव को समझे मंजिल,लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल,वर्तमान के मोहजाल में,आने वाला कल न भुलाएं,आओ फिर से दिया जलाएं।

आज अटलजी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यह अमर कविता हमारे बीच है और मुझे तो लगता है कि जब भी इसे पढ़ें या सुनें, एक नई ऊर्जा मिलती है। एक दीपक जिस तरह अपनी छोटी सी रोशनी से घने अंधेरे से भी लड़ने की हिम्मत दिखाता है, वह हिम्मत यह कविता भी पैदा करती है। न केवल अटलजी बल्कि दीपक जलाने को लेकर हरिवंश राय बच्चन की यह रचना भी कम मौजूं नहीं है! उन्होंने लिखा...

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ रागिनी,तुम आज दीपक राग गाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ!आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ!

तो सवाल यह है कि क्या हम कोई बुझा दीपक जलाने की कभी अपने तईं कोई कोशिश करते हैं? आप कहेंगे कि दिवाली के दिन जब कोई दीपक हवा के झोंकों से बुझ जाता है तो आप उसे जरूर फिर से जला देते हैं लेकिन ये तो त्यौहार की बात हुई। असल जिंदगी में क्या वाकई दीपक जलाने की कोशिश करते हैं?पहली बात तो यह है कि दीपक जलाने का आशय क्या है? इसके लिए हमें दीपक को प्रतीक रूप में देखना होगा। हमारी भारतीय और आध्यात्मिक संस्कृति में दीपक को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। दीपक की लौ को इतना पवित्र माना जाता है कि हम आरती के बाद लौ की गर्मी को अपनी हथेली में समेट कर माथे पर लगाते हैं। इसका मतलब यह है कि इस नश्वर संसार में ज्ञान से बढ़कर कुछ और नहीं है। आप ज्ञान का उजाला जितना अपने भीतर भरेंगे, आपका अंतर्मन उतनी ही उज्ज्वलता से परिपूर्ण होगा। मन उज्ज्वल होगा तो निर्मलता आएगी। निर्मलता आएगी तो जीवन से कटुता समाप्त होने लगेगी। आप निष्पाप हो जाएंगे। भगवान महावीर और भगवान बुद्ध से लेकर हमारे तमाम ऋषि-मुनियों और धर्म उपदेशकों ने हमें यही संदेश दिया है लेकिन मौजूदा वक्त का दुर्भाग्य है कि हम मन की उज्ज्वलता और निर्मलता को खोते जा रहे हैं। हमारे भीतर का अंधकार हमारे पूरे परिवेश को कालिमा से भर रहा है। नफरत की आंधी बह रही है और बहुत तेज बह रही है। केवल हमारे यहां नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बह रही है। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि मनुष्यता की जड़ें उखाड़ने पर आमादा है नफरत की ये आंधी! मौजूदा वक्त के लिए यह घनघोर चिंता का विषय होना चाहिए। सवाल है कि वाकई कितने लोग चिंतित हैं?

आप सोच रहे होंगे कि दिवाली के इस खुशनुमा त्यौहार पर मैं ये क्या बातें करने लगा! जी! इस तरह की बातें करने का यही मौजूं मौका है। दिवाली खुशियों का त्यौहार है और ऐसे में दुनिया के किसी भी कोने में समाज का कोई भी हिस्सा अंधेरी घनी रात में सिसक रहा है तो यह निश्चय ही हमारी चिंता का विषय है। अपनी जिंदगी में तो हमें दीपक जलाना ही चाहिए, हमें दूसरों के लिए खुद को दीपक भी बनाना चाहिए। हमारी संस्कृति की यही विशेषता है और यही विशेषता हमें दुनिया में श्रेष्ठ बनाती है।

हम श्रेष्ठ संस्कृति के लोग यदि कुछ नहीं करेंगे तो कौन करेगा? हमारे यहां तो तानसेन जैसे महागायक पैदा हुए जिनके बारे में कहा जाता है कि जब वे राग मेघ मल्हार गाते थे तो बादल बरस पड़ते थे और जब राग दीपक गाते थे तो दीपक जल उठते थे। ऐसी कहानी प्रचलित है कि उस जमाने के बादशाह अकबर उन्हें अपने दरबार में ले गए। एक बार अकबर ने हठ ठान लिया कि वे तानसेन से राग दीपक सुनकर ही रहेंगे। राजहठ के आगे तानसेन को झुकना पड़ा। उन्होंने राग दीपक गाया, दीपक जल भी उठे लेकिन माहौल में इतनी गर्मी पैदा हो गई कि वहां मौजूद सभी लोग जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। उसी तपन ने बाद में तानसेन की जान ले ली! मुङो नहीं पता कि इस कहानी में कितनी सच्चाई और कितनी वैज्ञानिकता है लेकिन संदेश स्पष्ट है कि यदि उजियारा फैलाना है तो दीपक को प्रज्‍ज्वलित करना होगा और जरूरत पड़े तो खुद की आहुति भी देनी होगी! इसीलिए अटलजी ने लिखा...

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा,अपनों के विघ्नों ने घेरा,अंतिम जय का वज्र बनाने,नव दधीचि हड्डियां गलाएं,आओ फिर से दिया जलाएं!

तो इस दिवाली बस इतनी सी गुजारिश है कि हम सब मिलकर जाति, पंथ और धर्म की काली विषमताओं को मनुष्यता के दीपक से उज्‍जवल कर दें। आप सभी को दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं। खासतौर पर अन्नदाता किसानों, मजदूर भाइयों तथा घर से बहुत दूर सीमा पर बिन बुलाए मेहमानों को रोकने में जुटे जवानों और उनके परिवारजनों को बधाई देता हूं। मेरा दिल कह रहा है...

हम दीप से दीप जलाएं,प्यार के गीत गाएं,जिसे जो मिल गयाया जिसे जो न मिलाउनके घर भी दीप जलाएंहम दीप से दीप जलाएं।

टॅग्स :दिवालीधनतेरसत्योहार
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