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दिनकर कुमार का ब्लॉग: नागरिकता विधेयक के विरोध में सुलगता पूर्वोत्तर

By धीरज पाल | Updated: January 21, 2019 13:16 IST

इस मसले को लेकर सभी पूर्वोत्तर राज्यों में लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और तमाम उग्रवादी संगठन इसी मुद्दे पर जनभावना को उकसाते हुए भाजपा के खिलाफ सशस्त्न अभियान चलाने की बात करने लगे हैं.

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प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने गैर-मुस्लिमों, खास तौर पर हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने का जो फैसला किया है, उसकी वजह से पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के सामने अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है और अधिकतर सहयोगी दलों ने उसका साथ छोड़ने की धमकी दी है. असम गण परिषद तो गठबंधन से अलग भी हो गई है. अगर नागरिकता संशोधन विधेयक को राज्यसभा में भी मंजूरी मिल गई तो पूर्वोत्तर में भाजपा के तमाम सहयोगी दल उसका साथ छोड़ देंगे. वैसी स्थिति में भले ही असम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार न गिरे लेकिन मणिपुर में भाजपा सरकार का पतन निश्चित है.

मेघालय और नगालैंड में भी उसे अपने मंत्रियों को सरकार से हटाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. विधेयक में धार्मिक असहिष्णुता के शिकार पड़ोसी देशों के ईसाइयों को भी भारत की नागरिकता देने की पेशकश की गई है, लेकिन इसका कोई प्रभाव मेघालय और नगालैंड में भाजपा के सहयोगी दलों पर नहीं पड़ा है. इसका एक मतलब यह भी है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जो पूर्वोत्तर की कुल 25 लोकसभा सीटों में से 21 सीट पर जीत हासिल करने का सपना देख रखा है, वह सपना भी पूरा नहीं हो पाएगा. 

भले ही पूर्वोत्तर के तीन राज्यों असम, त्रिपुरा और मणिपुर में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन वे बांग्लादेशी हिंदुओं को अपनी भूमि पर बसाने के लिए तैयार नहीं हैं. आजीविका के साधनों की कमी और रोजगार संकट के चलते पूर्वोत्तर के राज्य नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे हैं. इन राज्यों में पहले से ही बांग्लादेशी घुसपैठिए भारी तादाद में रह रहे हैं और ये राज्य घुसपैठियों की नई खेप को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं.

गौरतलब है कि सिख, पारसी, बौद्ध और जैन समुदाय के शरणार्थियों को नागरिकता देने की पेशकश का कोई विरोध पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में नहीं हो रहा है, जहां वे लोग पहले से बसे हैं. इसकी यही वजह है कि उन शरणार्थियों की तुलना में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों की तादाद कई गुना ज्यादा है. 

इस मसले को लेकर सभी पूर्वोत्तर राज्यों में लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और तमाम उग्रवादी संगठन इसी मुद्दे पर जनभावना को उकसाते हुए भाजपा के खिलाफ सशस्त्न अभियान चलाने की बात करने लगे हैं. माना जा रहा है कि पूर्वोत्तर को गंवाने की कीमत पर प. बंगाल, केरल और पंजाब के मतदाताओं को लुभाने के लिए मोदी सरकार इस विधेयक को राज्यसभा में भी पारित करवाने और इसे कानून का रूप देने की पूरी कोशिश करेगी.

मिजोरम के मुख्यमंत्नी जोरमथांगा ने कहा है, ‘‘मुङो उम्मीद है कि इस विधेयक को राज्यसभा में पारित नहीं किया जाएगा. अगर इसे पारित किया गया तो हम भाजपा के साथ अपने गठबंधन पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर होंगे.’’ त्रिपुरा में भाजपा की सहयोगी आईपीएफटी ने भी विधेयक का तीव्र विरोधकिया है. 

टॅग्स :असममोदी सरकार
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