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बिहार चुनाव परिणामः चुनावी रेवड़ी से उड़ रहा लोकतंत्र का मजाक

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: November 13, 2025 05:15 IST

Bihar Election Results: मतदाताओं को ‘खरीदने’ के उदाहरण के लिए महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर बिहार के ‘सुशासन बाबू’ ने राज्य की लगभग डेढ़ करोड़ महिलाओं को दस-दस हजार रुपए नगद बांट दिए.

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ठळक मुद्देशुरुआती दौर में यह काम चोरी-छिपे ढंग से होता था. अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रयोग हो चुके हैं.मतदान से पहले की रात को न जाने क्या-क्या बंटता था मतदाताओं के बीच. 

Bihar Election Results: बिहार के चुनाव परिणाम पर ‘रेवड़ी’ का क्या और कितना असर पड़ता है यह तो मतपत्रों की गणना के बाद ही पता चलेगा, पर यह एक खुला रहस्य है कि हमारे राजनीतिक दल यह मानकर चलते हैं कि देश का मतदाता रेवड़ियों से रिझाया जा सकता है. देखा जाए तो एक तरह से यह देश के मतदाता का अपमान ही है कि उसके बारे में ऐसी धारणा बन रही है. ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अचानक बन गई है, अर्से से हमारे  राजनीतिक दल इस रेवड़ी-संस्कृति का सहारा लेकर चुनाव जीतने का प्रयास करते रहे हैं. शुरुआती दौर में यह काम चोरी-छिपे ढंग से होता था.

मतदान से पहले की रात को न जाने क्या-क्या बंटता था मतदाताओं के बीच. अब भी ऐसा होता है, पर अब और भी रास्ते अपना लिए गए हैं मतदाताओं को ‘खरीदने’ के उदाहरण के लिए महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर बिहार के ‘सुशासन बाबू’ ने राज्य की लगभग डेढ़ करोड़ महिलाओं को दस-दस हजार रुपए नगद बांट दिए. अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रयोग हो चुके हैं.

यही सब देखते हुए यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या खैरात बांटकर चुनाव जीते जा सकते हैं? भले ही कुछ राजनीतिक-विश्लेषक यह कहते रहें कि ऐसा नहीं हो सकता, पर इस धारणा से इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे राजनेता यही मानते हैं कि खैरात काम आती है. बात सिर्फ रेवड़ी-संस्कृति तक सीमित नहीं है. चुनाव जीतने के लिए जिस तरह जाति और धर्म का सहारा लिया जा रहा है,

वह एक तरह से हमारे लोकतंत्र का मजाक उड़ाना ही है. जातियों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन और धर्म की दुहाई देकर मतदाता को भ्रमित करने की कोशिशें बिहार के इस चुनाव प्रचार में लगातार हुई हैं. यहीं यह बात भी गौर करने लायक है कि चुनाव में ठोस मुद्दे उठाने के बजाय किसी ‘जंगल राज’ और वोटों की कथित ‘चोरी’ जैसी बातों का सहारा लेना राजनीतिक दलों को कहीं अधिक उपयोगी लगने लगा है.

सत्तारूढ़ पक्ष से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी उपलब्धियों को आधार बनाकर मतदाता के समक्ष वोट मांगने जाएगा. पर देखा यह गया है कि सत्तारूढ़ पक्ष विपक्ष की बीस साल पुरानी सरकार के ‘जंगल-राज’ का डर दिखाकर वोट पाने की उम्मीद कर रहा है. यह मान भी लें कि लालू-राबड़ी की सरकार का कथित जंगल-राज बहुत बुरा था, तब भी यह सवाल तो उठता ही है कि आज की युवा पीढ़ी को दो दशक पुराने उस अनुभव के आधार पर कोई निर्णय लेने के लिए कैसे कहा जा सकता है?

विपक्ष से यदि कोई सवाल किया जाता है तो वह यह होना चाहिए कि उसके पास शासन का बेहतर विकल्प क्या है? यह मतदाता का अपमान नहीं तो और क्या है कि बिहार की वर्तमान सरकार की दस हजार रुपए की ‘रिश्वत’ के मुकाबले में विपक्ष तीस हजार रुपए नगद देने का प्रलोभन दे रहा है?

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