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आलोक मेहता का ब्लॉग: देश में सामाजिक स्वास्थ्य की नई क्रांति होने की बंधती उम्मीद

By आलोक मेहता | Updated: August 25, 2020 14:37 IST

प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य पहचान पत्न योजना की घोषणा की है। इसका अगर सही तरीके से पालन किया गया तो ये भारत में सामाजिक स्वास्थ्य की नई क्रांति साबिक हो सकेगी।

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ठळक मुद्देराष्ट्रीय स्वास्थ्य पहचान पत्न योजना भारत में सामाजिक स्वास्थ्य की नई क्रांति राष्ट्रीय स्वास्थ्य पहचान पत्न योजना को लेकर निजता के अधिकार के हनन के आरोप जैसी बातों से भारतीयों का ही नुकसान

सचमुच जादुई बात लगती है. आपके पास एक निश्चित नंबर वाला छोटा सा पुर्जा हो और आप अपनी या अपने परिजनों की जान जल्दी से जल्दी बचाने का इंतजाम कर लें. अभी नंबर वाले कागज न होने से कोविड के बजाय अन्य बीमारियों से अनेक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. 

यही नहीं कितने ही लोग दिल्ली या मुंबई में 25 से 50 लाख रुपयों के खर्च से पांच सितारा अस्पताल में ऑपरेशन और इलाज के बाद किसी अन्य शहर या विदेश में जाकर बीमार हो गए तो समुचित रिकॉर्ड नहीं होने से दुगुने खर्च के बावजूद स्वास्थ्य के नए संकट का सामना नहीं कर पाए. इस तरह की स्थितियों से रक्षा के लिए हाल ही में प्रधानमंत्नी द्वारा घोषित राष्ट्रीय स्वास्थ्य पहचान पत्न योजना के सही ढंग से क्रियान्वित होने पर भारत में सामाजिक स्वास्थ्य की नई क्रांति हो सकेगी.

अच्छी बात यह है कि यह घोषणा केवल राजनीतिक वायदा या भाषणबाजी नहीं है. महीनों के उच्चस्तरीय विचार-विमर्श तथा प्रारंभिक तैयारियों के बाद प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर पर स्वतंत्नता की रक्षा के संकल्प के साथ इसकी घोषणा की है. 

मोदी सरकार ने 2019 में नेशनल हेल्थ ब्लूप्रिंट बनाकर सार्वजनिक किया ताकि उस पर अधिकाधिक राय-सुझाव सामने आ सकें. इससे राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य सुरक्षा के कार्यक्र म बनाने में सुविधा हो रही है.

सरकार ने कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में परीक्षण के तौर पर स्वास्थ्य पहचान पत्न के लिए काम शुरू कर दिया है. नेशनल डिजिटल हेल्थ इको सिस्टम के अंतर्गत हेल्थ मास्टर डायरेक्टरी एंड रजिस्ट्री बनेगी. वेब हेल्थ पोर्टल, मोबाइल के लिए माई हेल्थ एप्प, काल सेंटर, हेल्थ सूचना एक्सचेंज स्थापित होंगे. 

इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर अभी से निजता के अधिकार और गोपनीयता के सवाल उठने लगे हैं. आधार कार्ड की अनिवार्यता ही नहीं जनगणना को लेकर भी ऐसी आपत्तियां उठाई जा रही हैं. इसमें कोई शक नहीं कि निजता के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए लेकिन सरकार और भारत के विशेषज्ञ स्वयं यह सुनिश्चित करेंगे. केवल भ्रम फैलाना और ऐसी क्रांतिकारी योजना को कानूनी दांवपेंच में फंसाना करोड़ों भारतीयों के हितों को नुकसान पहुंच सकता है.

आजादी के 73 वर्षो में शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिलने से देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी शैक्षिक तथा चिकित्सा के केंद्र दयनीय स्थिति में रहे हैं. संघीय व्यवस्था के कारण केंद्र और राज्य सरकारों ने अधिकतम बजट का प्रावधान नहीं किया. इसलिए नई योजना के क्रियान्वयन के लिए सरकारों को अधिकाधिक बजट का प्रावधान करना होगा. 

सरकारी अस्पताल की हालत ठीक होने पर निजी अस्पताल भी अधिक प्रतियोगी और आधुनिक उपकरणों की व्यवस्था करेंगे. राष्ट्रीय स्वास्थ्य पहचान पत्न होने पर आप सोचिए, सामान्य नागरिक को कितनी सुविधा हो जाएगी. उसके शरीर और स्वास्थ्य का रिकॉर्ड उस कार्ड के एक नंबर से देश के किसी भी हिस्से में देखा जा सकेगा. 

आप गांव में जन्मे हों या महानगर में अथवा नौकरी-कामधंधे के लिए किसी उम्र में कहीं भी हों, कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या होने पर उस कार्ड के साथ जिस डॉक्टर और अस्पताल के पास पहुंचेंगे, उन्हें यह जानकारी मिल सकेगी कि कभी आपको मलेरिया बुखार, पेट-सांस-दिल या जिगर की कोई परेशानी हुई या नहीं हुई है तो किन दवाइयों से उपचार हुआ है.

दुर्घटना की स्थिति में तो और भी आसानी होगी क्योंकि आप बोलने की हालत में भी नहीं होते. इससे आपके जीवन की रक्षा करने के लिए तत्काल चिकित्सा के सभी उपाय किए जा सकेंगे. याद करें, जन धन योजना में खाता खोलने और आधार कार्ड से जोड़ने पर एक वर्ग ने आपत्ति की थी, लेकिन कोविड-19 के महासंकट के दौरान बीस करोड़ परिवारों के खातों में तत्काल छोटी ही सही, आवश्यक धनराशि मिल सकी. 

आयुष्मान भारत के तहत लाखों लोगों को लाभ मिल रहा है. यदि आप कोई अपराध नहीं कर रहे हैं तो करोड़ों लोगों के साथ आपकी सेहत का विवरण भी दर्ज हो जाएगा तो क्या कोई नुकसान हो जाएगा? 

जो लोग गरीब लोगों की निजता की बात करते हैं, वे अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप या दुबई की यात्रा के वीजा के लिए पूरे खानदान का ब्यौरा देने, हेल्थ चेकअप के सारे रिकॉर्ड देने में शान समझते हैं. बहरहाल अब भारत के गांव से शहर तक के गरीब कम शिक्षित लोग अपना और देश का भला-बुरा समझने लगे हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य की नई क्रांति से देश का भविष्य अधिक सुरक्षित और खुशहाल हो सकेगा.

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