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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: चुनौतियां तो हैं, पर संकट नहीं

By अभय कुमार दुबे | Updated: January 25, 2021 14:56 IST

इस वर्ष तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों ने दिल्ली का ऐतिहासिक घेरा डाला हुआ है. कोई देखना चाहे तो देख सकता है कि बेरोजगारी के खिलाफ एक बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन नेपथ्य में अपनी तैयारी कर रहा है.

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क्या आज किसी को याद है कि दस साल पहले 2011 के गणतंत्र दिवस के मौके पर हमारे सामने किस किस्म का राजनीतिक नजारा था. मनमोहन सरकार सात साल पूरे कर चुकी थी, और उस समय कांग्रेस सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के जरिये चुनौती देने के हालात बन रहे थे.

तीन महीने बाद अन्ना हजारे के अनशन के बाद ही सरकार की साख गिरनी शुरू हो गई थी. 2014 में इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को बहुमत प्राप्त हुआ था. अब मोदी सरकार के भी साढ़े छह साल पूरे हो चुके हैं.

क्या मोदी सरकार उस समय की कांग्रेस सरकार की तरह किसी तरह की चुनौती और उसके कारण पैदा हुए संकट का सामना कर रही है? नि:संदेह किसान आंदोलन के रूप में मोदी सरकार भी अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है. लेकिन अंतर यह है कि यह चुनौती अभी तक उसके लिए किसी तरह के संकट का कारण नहीं बन पाई है.

केंद्र सरकार की असाधारण मजबूती भाजपा की राज्य सरकारों की कमजोरियों की भरपाई कर रही है. जब नोटबंदी जैसी बड़ी-बड़ी गलतियां करने और टिकाऊ किस्म के किसान आंदोलन के बाद भी सरकार संकटग्रस्त न हो, तो उसकी कमियों के बजाय उसे बचाने वाले प्रमुख कारकों की तरफ ध्यान देना चाहिए.

मेरा विचार है कि अगले दस साल में पांच प्रमुख पहलुओं के कारण इस सरकार की प्रतिष्ठा कई झटके खाने के बावजूद टिकी रह सकती है. पहला, हिंदू बहुसंख्यकवाद का एजेंडा लगातार मजबूत होता चला जाएगा. भाजपा के विरोधी भी अपनाने के लिए मजबूर होंगे.

दूसरा, लोकतांत्रिक विपक्ष भाजपा के खिलाफ किसी भी तरह की कार्यक्रमगत एकता बनाने में मोटे तौर पर नाकाम रह सकता है. पिछले सात वर्षो का अनुभव अगर कोई संदेश देता है तो वह यही है कि राज्यों की राजनीति में भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी करने के अलावा विपक्ष के पास किसी सक्षम राष्ट्रीय योजना का अभाव है.

तीसरा, गरीबों और कमजोर जातियों (मुसलमानों समेत) की राजनीति करने वाली सामाजिक न्याय और वामपंथ की राजनीति नए दशक में पूरी तरह से वैचारिक और व्यावहारिक दिवालियेपन के साथ प्रवेश करेगी.

चौथा, ऐसे एकतरफा माहौल में गैर-पार्टी लेकिन गहरे राजनीतिक मंतव्यों से संपन्न आंदोलनों की संख्या और बारम्बरता बढ़ती चली जाएगी. ध्यान रहे कि पिछले साल इन्हीं दिनों नागरिकता के सवाल पर आंदोलन हो रहे थे (जिनकी असम में एक बार फिर से शुरुआत हो चुकी है, और जो बंगाल के चुनाव में अहम मुद्दे के तौर पर मौजूद रहेंगे).

इस वर्ष तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों ने दिल्ली का ऐतिहासिक घेरा डाला हुआ है. कोई देखना चाहे तो देख सकता है कि बेरोजगारी के खिलाफ एक बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन नेपथ्य में अपनी तैयारी कर रहा है.

पांचवां, कॉर्पोरेट हितों और सत्तारूढ़ राजनीतिक हितों के बीच सीधा और खुला समीकरण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और संसाधनों के सामाजिक बंटवारे की प्रकृति का फैसला करेगा. इसका एक पहलू है कृषि कानूनों को वापस न लेने की सरकारी जिद, और दूसरा पहलू है आर्थिक जीवन के हर क्षेत्र के कॉर्पोरेटीकरण का निरंतर चलता हुआ अभियान. 

अगले दस साल तक इन पांच पहलुओं के टिकाऊ रहने के दो बुनियादी कारण हैं- पहला, हिंदू बहुसंख्यवाद के राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा चुनावी धरातल पर बड़े-बड़े सामाजिक गठजोड़ बनाने की कुशलता का लगातार प्रदर्शन. दूसरा, भाजपा समेत विभिन्न सत्तारूढ़ शक्तियों द्वारा अपनाए जाने वाले एक नए ‘वेलफेयर मॉडल’ की व्यावहारिक सफलता और राजकीय लोकोपकार के पुराने मॉडल का निष्प्रभावी होना.

नया लोकोपकारी मॉडल भाजपा को राजनीतिक झटकों और सदमों को पचा जाने की क्षमता प्रदान करता है. पुराने लोकोपकारी मॉडल का नमूना मनरेगा जैसा कार्यक्रम है, नए मॉडल का नमूना प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना है.

प्रेक्षकों को ध्यान होगा कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के तुरंत बाद पहला कदम जनधन योजना के खाते खोलने के रूप में उठाया था. दरअसल, वे नए लोकोपकारी मॉडल की अधिरचना बना रहे थे.

नरेंद्र मोदी ने दिखाया है कि भले ही पश्चिमी उप्र, हरियाणा और पंजाब के किसानों ने दिल्ली घेर ली हो- वे दस करोड़ किसानों के खाते में 18 हजार करोड़ रु. एक क्षण में भेज कर उन्हें इन आंदोलनकारी किसानों से अलग दिखा सकते हैं. इस तरह की युक्तियां अर्थव्यवस्था के संपूर्ण कॉर्पोरेटीकरण के लिए सुरक्षित गुंजाइश प्रदान कर रही हैं.

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