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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: मोदी-विहीन भारत की संभावनाएं बहुत कमजोर, पीएम को नापसंद करने वालों को अभी करना होगा लंबा इंतजार

By अभय कुमार दुबे | Updated: June 8, 2022 12:00 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखा दिया है कि सत्ता में टिके रहने की कामना और मानसिकता की उनमें कोई कमी नहीं है. ऐसे में जाहिर है जो उन्हें नापसंद करते हैं, उनके पास लंबा इंतजार करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल के आठ साल पूरे हो चुके हैं. आठ साल पूरे होने पर मोदी के कार्यकाल पर प्रकाश डालने वाली नाना प्रकार की समीक्षाओं की बाढ़ आई हुई है. लेकिन सत्ता में उनके टिकने की क्षमता के मर्म के बारे में बहुत कम बातें सुनने-पढ़ने को मिल रही हैं. सत्ता प्राप्त करने वाले नेताओं की सूची बहुत लंबी है, पर सत्ता में टिक सकने वालों की बहुत छोटी. 

नरेंद्र मोदी इन टिकाऊ नेताओं की सूची के शीर्ष पर हैं. एक बार सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद पार्टी की भीतरी राजनीति के चलते अपदस्थ न होने, या चुनाव न हारने की उनकी काबिलियत गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में ही सामने आ गई थी. शासन-प्रशासन का कोई अनुभव न होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद पूरे बारह साल और तीन विधानसभा चुनावों के दौरान एक बार भी नहीं सुना गया कि गुजरात भाजपा के भीतर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी है या हो सकता है. 

चुनाव के दौरान भी यह एहसास कभी नहीं हुआ कि वे हार सकते हैं. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से भी यही लग रहा है कि जिस तरह की निर्द्वंद्व राजनीति उन्होंने गांधीनगर में बैठकर की थी, वैसी ही (या उससे भी कहीं अधिक प्रभावी) वे दिल्ली में कर रहे हैं. हालांकि दिल्ली की राजनीति गुजरात की राजनीति के मुकाबले बहुत जटिल है, लेकिन आज की तारीख में न केवल मोदी का वर्तमान निरापद है, बल्कि भविष्य भी खासा सुरक्षित प्रतीत हो रहा है. उनकी इस स्थिति को अगर उनके ही शब्दों में बयान किया जाए तो चुनाव-मुहिम के दौरान प्रधानमंत्री का यह वाक्य याद आता है कि ‘जिस योजना का शिलान्यास हम करते हैं, उसका उद्घाटन हमारे ही हाथों होता है.’

नरेंद्र मोदी ने पिछले आठ साल में अपनी और अपनी सरकार की छवि को कम से कम तीन बार बड़ा ‘कोर्स करेक्शन’ करके अर्थात् अपनी रीति-नीति में तब्दीली करके बचाया है. अगर इन तीन मुकामों पर वे कामयाब न होते तो हो सकता है कि आज उनका राजनीतिक दबदबा इस तरह से हावी न होता. 

ऐसा पहला मौका सत्ता संभालने के साल भर बाद उस समय आया था जब मोदी के सामने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पांचवीं बार लाने या न लाने के बीच का फैसला करने की चुनौती थी. मोदी ने इस परिस्थिति को भांपा और लाभ-हानि का अंदाजा लगाने के बाद अगस्त, 2015 में अध्यादेश न लाने का फैसला किया. अगर वे ऐसा न करते हो सकता है कि अपने शासनकाल की शुरुआत में ही उन्हें एक बड़े जनांदोलन का सामना करना पड़ता. 

दूसरा मौका तब आया जब बराक ओबामा से टीवी पर बात करते समय उनके खास तरह के सूट पर कटाक्ष करते हुए राहुल गांधी ने उनकी सरकार को ‘सूट-बूट की सरकार’ करार दिया. इसके बाद मोदी ने अपनी छवि के पुनर्निर्माण पर योजनाबद्ध तरीके से काम किया. फिर जिस मोदी का राष्ट्रीय मंच पर आगमन हुआ, वह गरीबों का सेवक और पिछड़े समाज का पुत्र था. आज सूट-बूट की सरकार वाला फिकरा लोग पूरी तरह से भूल चुके हैं.

तीसरा और सबसे बड़ा संकट उस समय आया जब एक साल से ज्यादा चलने वाले प्रभावी किसान आंदोलन ने मोदी के सामने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने या न लेने का विकल्प रखा. मोदी ने कानून वापसी करके सभी को चकित कर दिया. आज हमारे पास सिंहावलोकन करने का मौका है. अगर मोदी ने ऐसा न किया होता और चलते हुए आंदोलन के साये में उ.प्र. के चुनाव हुए होते तो आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ 39 फीसदी की एंटीइनकम्बेंसी बिना किसी खास कोशिश के पचास फीसदी के ऊपर जा सकती थी. 

उ.प्र. का चुनाव हारना मोदी के लिए विनाशकारी साबित होता. लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावी सफलता के पीछे तरह-तरह के कारक काम करते हैं. कई ऐसी जटिलताएं होती हैं जिनका अनुमान  पहले से नहीं लगाया जा सकता. इसमें निजी स्तर पर स्वास्थ्य ठीक रहने जैसे आयामों का भी महत्व होता है. लेकिन इससे भी आगे बढ़ कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, सरकार विरोधी भावनाओं का स्तर, पड़ोसी देशों से संबंध और अंतर्राष्ट्रीय जगत में मोदी सरकार की हैसियत भी प्रभावी भूमिका निभाने वाली है. 

जो भी हो, मोदी ने दिखा दिया है कि सत्ता में टिके रहने की कामना और मानसिकता की उनमें कोई कमी नहीं है. उन्हें नापसंद करने वालों को शायद मोदी-विहीन भारत के लिए बहुत दिन इंतजार करना होगा.

टॅग्स :नरेंद्र मोदीभारतीय जनता पार्टीकिसान आंदोलनउत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव
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