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चाबहार पोर्ट क्षतिग्रस्त होने से लगेगा झटका!

By हरीश गुप्ता | Updated: March 11, 2026 05:24 IST

सरकार अब स्थिति का आकलन करने और भारतीय निवेशों और परिचालनों पर इसके प्रभाव का पता लगाने के लिए ईरान में एक दल भेज रही है.

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ठळक मुद्देनुकसान का आकलन अभी भी किया जा रहा है.अधिकारियों का मानना है कि नुकसान काफी बड़ा हो सकता है. बंदरगाह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रवेश द्वार है.

डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व वाले अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष पश्चिम एशिया में भारत के रणनीतिक हितों पर एक गंभीर और चिंताजनक छाया डाल रहा है. तात्कालिक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के अलावा, नई दिल्ली को अब ठोस नुकसान का सामना करना पड़ रहा है - जिनमें सबसे गंभीर नुकसान दक्षिण-पूर्वी ईरान में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह को कथित रूप से हुए नुकसान और उसके बंद होने से संबंधित है. जानकार सूत्रों के अनुसार, हालिया संघर्षों में बंदरगाह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है. नुकसान का आकलन अभी भी किया जा रहा है,

लेकिन अधिकारियों का मानना है कि नुकसान काफी बड़ा हो सकता है. सरकार अब स्थिति का आकलन करने और भारतीय निवेशों और परिचालनों पर इसके प्रभाव का पता लगाने के लिए ईरान में एक दल भेज रही है. भारत के लिए चाबहार महज एक व्यावसायिक परियोजना से कहीं अधिक है. यह बंदरगाह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रवेश द्वार है,

जो नई दिल्ली को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और व्यापक मध्य एशियाई क्षेत्र तक पहुंच प्रदान करता है. यह परियोजना लंबे समय से भारत की यूरेशिया से संपर्क और भू-राजनीतिक पहुंच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है. विडंबना यह है कि इस बंदरगाह को हाल ही में एक नाजुक राजनयिक राहत मिली थी.

पिछले साल अक्तूबर में, अमेरिका ने वाशिंगटन के नामित राजदूत सर्जियो गोर की गहन बातचीत के बाद चाबहार पर लगे प्रतिबंधों में एक और छूट देने पर सहमति जताई थी. खबरों के अनुसार, गोर ने नई दिल्ली में गोपनीय चर्चाओं की एक श्रृंखला के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों के साथ लंबी बैठकें की थीं.

इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. भारत ने मई 2024 में चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल का अनुबंध किया था, जो उसकी दीर्घकालिक क्षेत्रीय रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था. बंदरगाह के क्षतिग्रस्त होने से वहां कार्यरत भारतीय संस्थाओं को अनिश्चितता और संभावित दंड का सामना करना पड़ रहा है, जिससे तेजी से अस्थिर होते क्षेत्र में भारत की विदेशी रणनीतिक संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा हो रही हैं.

वी.के. सक्सेना होने का महत्व

हाल ही में हुए राज्यपालों के फेरबदल में वी.के. सक्सेना की नियुक्ति ने भले ही सुर्खियां न बटोरी हों, लेकिन इसका रणनीतिक महत्व काफी अधिक है. सक्सेना को लद्दाख का चौथा उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है. वे आर.के. माथुर, बी.डी. मिश्रा और कविंदर गुप्ता जैसे पूर्व नियुक्त उपराज्यपालों का स्थान लेंगे. यह केंद्र शासित प्रदेश महज छह साल पहले ही बना था.

केंद्र सरकार हिमालयी केंद्र शासित प्रदेश के लिए इस संवेदनशील समय में सक्सेना के प्रशासनिक अनुभव पर भरोसा कर रही है. दिल्ली के उपराज्यपाल के रूप में पूर्व में सेवा दे चुके सक्सेना ने अपनी मुखर और सक्रिय शासन शैली के लिए ख्याति अर्जित की. अपने कार्यकाल में उन्होंने राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने अंततः 2025 में भाजपा को राजधानी में सत्ता में पुनः प्रवेश दिलाने में मदद की. नरेंद्र मोदी द्वारा विशेष रूप से चुने गए सक्सेना ने खादी और ग्रामोद्योग आयोग में काम के लिए सराहना हासिल की थी.

अब उनसे लद्दाख में विकास और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की उम्मीद की जा रही है. उनकी नियुक्ति लेह सर्वोच्च निकाय और कारगिल लोकतांत्रिक गठबंधन जैसे समूहों द्वारा राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की लगातार मांगों के बीच हुई है, जिससे उनकी भूमिका प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से संवेदनशील हो जाती है.

कांग्रेस को चुभ रहा टीएमसी का रुख

राजनीति में जो चीजें साफ दिखती हैं, अक्सर भ्रामक होती हैं. यही कारण है कि एक अहम सवाल पूछा जा रहा है: क्या ममता बनर्जी सचमुच न सिर्फ पश्चिम बंगाल में, बल्कि पूरे देश में भाजपा को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं? अगर गौर से देखा जाए, तो एक पैटर्न नजर आता है - कांग्रेस को कमजोर करना. गोवा में, 2022 में टीएमसी की आक्रामक एंट्री ने भाजपा की तुलना में कांग्रेस को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाया.

टीएमसी को 2022 में 5.2 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांग्रेस के वोट शेयर में 4.9 प्रतिशत की गिरावट आई. आम आदमी पार्टी को भी लगभग सात प्रतिशत वोट मिले, और इन दोनों ने मिलकर कांग्रेस को बुरी तरह हराया. राज्य में कांग्रेस कभी उबर नहीं पाई. मेघालय में, ममता बनर्जी ने एक कदम आगे बढ़कर कांग्रेस में फूट डाली और उसके ज्यादातर विधायकों को टीएमसी में शामिल कर लिया.

झारखंड में भी ऐसा ही प्रयास किया गया, हालांकि वह सफल नहीं हुआ. अब यही रणनीति असम और केरल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भी अपनाई जा रही है. टीएमसी दोनों राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, जहां कम वोट शेयर भी निर्णायक साबित हो सकता है.

असम में कांग्रेस के गौरव गोगोई ने टीएमसी नेतृत्व से संपर्क भी किया, लेकिन उनके प्रयास व्यर्थ गए. केरल में दो बार के वाम समर्थित विधायक पीवी अनवर टीएमसी में शामिल हो गए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि ममता बनर्जी के प्रवेश से कांग्रेस भाजपा से भी ज्यादा कमजोर हो सकती है, भले ही इससे अप्रत्यक्ष रूप से सीपीएम को फायदा हो.

ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी को इसकी कोई चिंता नहीं है. बंगाल में सीपीएम अब कोई मजबूत ताकत नहीं रह गई है; हालांकि, कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है और टीएमसी इंडिया गठबंधन में एक अनौपचारिक सहयोगी हो सकती है.

खान को क्यों निकाला गया !

पांच मार्च का दिन बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा. शायद यह पहली बार था जब किसी राज्य ने मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों को खोया. कुछ ही घंटों में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, दोनों के ही बिहार की सत्ता से बाहर होने की बात तय हो गई. कुमार का जाना कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी, हालांकि राज्यसभा में जाने के उनके फैसले पर सवाल जरूर उठे.

असली हैरानी तो खान को अचानक हटाए जाने से हुई. केंद्र सरकार ने तुरंत ही सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन को नया राज्यपाल नियुक्त कर दिया. सत्ताधारी भाजपा द्वारा राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चली गई सुनियोजित राजनीतिक चाल से सत्ताधारी भाजपा के इस कदम का संकेत मिलता है.

विडंबना यह है कि खान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद उम्मीदवार थे, जिन्हें 2019 में केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया था और फिर दिसंबर 2024 में बिहार स्थानांतरित कर दिया गया था. राज्यपाल के पद पर छह साल से अधिक समय बिताने के बाद - और एक समय तो उनके उपराष्ट्रपति पद का संभावित उम्मीदवार होने की भी चर्चा थी - उनका अचानक पद छोड़ना अभी भी रहस्यमय और राजनीतिक रूप से पेचीदा है.

टॅग्स :ईराननरेंद्र मोदीS Jaishankarअमेरिकाडोनाल्ड ट्रंपविनय कुमार सक्सेनादिल्लीलद्दाखबिहारकेरलनीतीश कुमारNitish Kumar
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