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‘ऑकस’ को अपनी परमाणु पनडुब्बी तकनीक के लिए अवसर के रूप में देख रहा रूस

By भाषा | Updated: September 25, 2021 19:16 IST

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(एलेक्सेई डी मुराविएव, कर्टिन विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर)

बेंटली (ऑस्ट्रेलिया), 25 सितंबर (द कन्वरसेशन) अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के बीच हुए नए ‘ऑकस’ समझौते पर विश्वभर के देशों ने मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी हैं। चीन तथा फ्रांस ने जहां तत्काल इसका विरोध किया, वहीं जापान और फिलीपीन इस करार का स्वागत करते नजर आए। नाभिकीय शक्ति संपन्न पनडुब्बियों से लैस कुछ देशों में से एक रूस ने अपनी आरंभिक प्रतिक्रिया में सावधानी बरती और जल्दबाजी नहीं दिखाई।

क्रेमलिन की ओर से सावधानी से तैयार किये गए बयान में कहा गया, “कोई रुख अपनाने से पहले हमें इसका लक्ष्य, उद्देश्य और तरीका समझना होगा। इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है। अब तक बहुत कम जानकारी प्राप्त हुई है।”

कुछ रूसी राजनयिक अधिकारियों ने अपने चीनी समकक्षों के साथ सुर में सुर मिलाते हुए चिंता व्यक्त की, कि (अमेरिका और ब्रिटेन की सहायता से) ऑस्ट्रेलिया द्वारा नाभिकीय शक्ति सम्पन्न पनडुब्बियां विकसित करना ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (एनपीटी) का उल्लंघन होगा और इससे क्षेत्र में “हथियारों की दौड़ तेज हो जाएगी।”

उन्होंने सुझाव दिया कि नाभिकीय पनडुब्बी के बेड़े का निर्माण अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में होना चाहिए। हालांकि, ऐसा लगता नहीं कि ऑस्ट्रेलिया इस विचार को स्वीकार करेगा।

‘एशियाई नाटो का शुरुआती संस्करण’

नए सुरक्षा करार के बारे में जैसे ही और स्पष्टता सामने आई, क्रेमलिन के बयान बदलने लगे। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका के ऑस्ट्रेलिया के पूर्व राजदूत, जो हॉकी ने खुलकर कहा कि ‘ऑकस’ का उद्देश्य हिन्द प्रशांत क्षेत्र में केवल चीन को चुनौती देना ही नहीं है, बल्कि रूस की शक्ति को सीमित करना भी है। इसके तुरंत बाद, रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव निकोलाई पत्रुशेव ने इस समझौते को “एशियाई नाटो का शुरुआती संस्करण” करार दिया।

उन्होंने कहा, “मुख्य रूप से चीन रोधी और रूस रोधी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए वाशिंगटन अन्य देशों को इस संगठन में शामिल करने की कोशिश करेगा।” कैनबेरा के लिए रूस के बयानों में इस तरह का बदलाव आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। रूस ने क्षेत्र में नए समझौतों से लेकर नई हथियार प्रणालियों के विकास तक, क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण में किसी भी प्रकार के परिवर्तन को एक सैन्य खतरे के रूप में देखा है जिसका जवाब दिया जाना चाहिए।

अपनी पनडुब्बियों का विपणन करना

अपनी प्रतिक्रिया के तौर पर रूस किन संभावित विकल्पों का चयन कर सकता है? चूंकि, मास्को ‘ऑकस’ को एक राजनीतिक और सैन्य संकट के रूप में देख रहा है लेकिन अभी तक इसे कोई खतरा नहीं मान रहा, इसलिए उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया राजनीतिक दांवपेंच और कोई मौका न चूकने तक सीमित रहेगी। रूस ‘ऑकस’ पनडुब्बी समझौते को एक ऐसी घटना के तौर पर देख सकता है जिससे उसे इस क्षेत्र के उन देशों को अपनी परमाणु पनडुब्बियां बेचने में मदद मिलेगी जिन्हें इसकी आवश्यकता है।

यह कोई खोखला विचार नहीं बल्कि रूस के रक्षा मंत्रालय से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा सुझाया गया है। रूस की परमाणु पनडुब्बियां सबसे अच्छी मानी जाती हैं और ऐतिहासिक तौर पर वह अपनी इस तकनीक को किसी से साझा करने में विफल रहा है।

अब तक रूस ने 1987 से केवल भारत को ‘लीज’ पर परमाणु पनडुब्बियां दी हैं जो सोवियत निर्मित होती थी और भारतीय नौसेना उसका उपयोग करती थी लेकिन रूस ने भारत को तकनीक का हस्तांतरण नहीं किया। अगर रूस अन्य देशों को परमाणु पनडुब्बियां देने का निर्णय लेता है तो उसे खरीदारों की कमी नहीं होगी।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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