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ब्लॉग: इंटरनेट से बढ़ता अंतरिक्ष में कचरे का खतरा

By अभिषेक कुमार सिंह | Updated: December 5, 2024 06:45 IST

इसके अलावा चूंकि लंबी दूरी की बहुराष्ट्रीय मिसाइलों के निर्माण और जासूसी के काम में उपग्रहों के इस्तेमाल अंतरिक्ष संबंधी कार्यक्रमों से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए इन कार्यक्रमों का सटीक डाटा सार्वजनिक नहीं किया जाता.

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दुनिया के एक मशहूर कारोबारी, टेस्ला और एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मालिक एलन मस्क की दूरसंचार कंपनी- स्टारलिंक इंटरनेट सर्विसेज फिलहाल करीब सौ देशों को इंटरनेट सेवाएं दे रही है. इस कंपनी की बातचीत भारत से भी चल रही है. वह इंटरनेट - जो तमाम सुविधाओं का वाहक बन गया है, इधर कई वजहों से चर्चा में है. इसकी बदौलत जो डिजिटल क्रांति हुई है, उसने कई कामकाज आसान कर दिए हैं. अब तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तकनीक भी इसी इंटरनेट के कंधे पर सवार होकर नए-नए गुल खिला रही है.

पर इसी इंटरनेट से कई नुकसान भी हो रहे हैं. इनसे पूरी दुनिया परेशान है. एक समस्या इसकी वजह से पैदा हो रहे मानसिक प्रदूषण और डाटा के रूप में जन्म ले रहे कचरे की है, जिस पर ज्यादा विचार नहीं हो रहा है. लेकिन यह इंटरनेट अब अंतरिक्ष में कचरे की भरमार का कारक भी बन गया है. यानी दूरसंचार क्रांति धरती पर ही विविध किस्मों का कबाड़ पैदा नहीं कर रही है, बल्कि अंतरिक्ष में जिन उपग्रहों (सैटेलाइट्स) की बदौलत इंटरनेट हम तक पहुंच रहा है, वे उपग्रह पृथ्वी के ऊपर भी समस्याओं में इजाफा कर रहे हैं.

अंतरिक्ष में प्रदूषण या सपाट शब्दों में कहें तो कचरा, कोई नई समस्या नहीं है. सितारों के निर्माण की प्रक्रिया में बहुत सा कचरा पहले ही हमारे नजदीकी अंतरिक्ष में मौजूद रहा है. पर जब से अंतरिक्ष इंसानी गतिविधियों का केंद्र बना है, वहां इस कचरे ने नया और ज्यादा खतरनाक रूप धर लिया है. हम जिस इंटरनेट पर आज इतने ज्यादा निर्भर हो गए हैं, उसे हम तक पहुंचाने के एक जरिये के रूप में इस्तेमाल में आ रहे उपग्रह अंतरिक्षीय कबाड़ में इजाफे की बड़ी वजह बन गए हैं. ये उपग्रह अंतरिक्ष में मुख्यतः दो स्थानों पर हैं. एक तो पृथ्वी की निचली कक्षाओं (लो ऑर्बिट) में, जहां खास तौर से अकेले एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक ने आज की तारीख तक 6764 उपग्रह पहुंचा दिए हैं. इनमें से 6714 काम कर रहे हैं, जबकि शेष कबाड़ होकर चक्कर काट रहे हैं.

स्टारलिंक की मदद करने वाली एलन मस्क की एक अन्य कंपनी- स्पेसएक्स की योजना आगामी वर्षों में 42 हजार उपग्रह और भेजने की है ताकि दुनिया के चप्पे-चप्पे पर इंटरनेट पहुंचाया जा सके. स्टारलिंक ने वर्ष 2019 में अपना पहला दूरसंचार उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा था. इसके अगले पांच साल में ही उसके उपग्रहों की संख्या साढ़े छह हजार पार गई है. अंतरिक्ष की ऊपरी कक्षाओं में भारत समेत दुनिया के दर्जनों देशों के 3135 संचार उपग्रह अलग से तैनात हैं. अभी तक का आकलन कहता है कि पृथ्वी की निचली कक्षाओं में 14 हजार से ज्यादा उपग्रह मौजूद हैं, जिनमें से करीब 3500 निष्क्रिय यानी कबाड़ हो चुके हैं.

इस कबाड़ पर नजर रखने वाली अमेरिकी संस्था ‘स्लिंगशॉट एयरोस्पेस’ का कहना है कि ये निष्क्रिय उपग्रह कचरा बन गए हैं. इसके अलावा तमाम अन्य अंतरिक्षीय गतिविधियों से हमारे करीबी अंतरिक्ष में 12 करोड़ से ज्यादा छोटे-बड़े मलबे के टुकड़े तेजी से चक्कर काटने लगे हैं. ऐसा तो नहीं है कि किसी रोज यह कचरा अंतरिक्ष से छिटके और हमारे ऊपर आ गिरे. असल में, खतरे कुछ दूसरे किस्म के हैं.

वे दो तरह के हैं. एक तो जितनी बड़ी संख्या में नए-नए उपग्रह विभिन्न उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं, अचानक किसी दिन वहां मौजूद कचरा उनके रास्ते में आ सकता है और पूरे मिशन का सत्यानाश कर सकता है. दूसरे, जिस तरह की भीड़ पृथ्वी की निचली कक्षा में हो गई है, वहां चक्कर काटते उपग्रहों से ही इस कचरे का विनाशकारी आमना-सामना हो सकता है.

इन अंदाजों का सटीक आकलन करने से पता चलता है कि पृथ्वी की सतह से करीब 160 से 2 हजार किलोमीटर की ऊंचाई वाला जो इलाका निचली कक्षा (लो ऑर्बिट) कहलाता है, उसमें मौजूदा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के अलावा हजारों छोटे निगरानी और संचार उपग्रह हैं. वैश्विक संचार, निगरानी, मौसम के पूर्वानुमान, समुद्रों की हलचलों पर नजर रखने और वैज्ञानिक अनुसंधानों के काम में आने वाले ये सारे प्रबंध वैसे तो बेहद उपयोगी हैं, लेकिन समस्या यह है कि कोई देश यह नहीं बताता है कि उसके किस उपग्रह का मकसद क्या है और वह आखिर कितने उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ने वाला है.

इसकी वजह यह है कि इन उपग्रहों के दोहरे उपयोग- सैन्य और नागरिक हैं. इसलिए ऐसी कोई वैश्विक केंद्रीय व्यवस्था नहीं बन पाई है जो उपग्रहों के साझा इस्तेमाल की राह खोले और बहुत जरूरी होने पर ही ऐसे उपग्रह रवाना किए जाएं. सिर्फ सरकारें ही नहीं, निजी कंपनियां भी कारोबारी हितों के मद्देनजर इनसे जुड़ी जानकारियों और डाटा का खुलासा नहीं करती हैं. ऐसी स्थितियों का परिणाम क्या हो सकता है, इसकी एक नजीर इसी साल (2024) के दो महीनों जून और अगस्त माह में मिली थी.

जून में एक रूसी उपग्रह विस्फोट के साथ फट गया तो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए उससे छिटके कचरे की जद में आने का खतरा पैदा हो गया. इसके बाद अगस्त में अंतरिक्ष में काफी ऊंचाई पर पहुंचा एक चीनी रॉकेट फटा तो उसके टुकड़े मलबे की शक्ल में अंतरिक्ष में फैल गए. वर्ष 2021 में चीन ने संयुक्त राष्ट्र की अंतरिक्ष संस्था को बताया कि मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की ही एक इकाई स्टारलिंक इंटरनेट सर्विसेज के उपग्रह दो बार चीन के अंतरिक्ष स्टेशन के बहुत पास आ गए थे. पहली जुलाई और 21 अक्तूबर 2021 को हुई इन घटनाओं को लेकर चीन ने काफी नाराजगी दिखाई थी.

विशाल अंतरिक्षीय पैमाने पर हो रही प्राकृतिक गतिविधियों पर हमारा कोई वश नहीं चलता, लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष में पैदा हो रहे कचरे की रोकथाम कुछ अर्थों में जरूर संभव है. इस बारे में संयुक्त राष्ट्र के एक पैनल का सुझाव है कि इंसानी गतिविधियों से अंतरिक्ष में पैदा हो रहे कबाड़ को रोकने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को एक साथ लाकर कोई तालमेल बनाया जाए. इस पैनल से जुड़े विशेषज्ञों का सुझाव है कि अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन की तरह इस समस्या को लेकर भी कुछ ठोस नियम-कायदे बनाए जाएं और उन्हें सख्ती से लागू किया जाए.

इसमें मौजूदा उपकरणों जैसे कि टेलिस्कोपों, रडार और सेंसरों का प्रचुर इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए. पर समस्या यह है कि ज्यादातर देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर गोपनीयता बरतते हैं. निजी अंतरिक्ष एजेंसियां भी तकनीक के चोरी होने के भय से आंकड़े साझा नहीं करतीं. इसके अलावा चूंकि लंबी दूरी की बहुराष्ट्रीय मिसाइलों के निर्माण और जासूसी के काम में उपग्रहों के इस्तेमाल अंतरिक्ष संबंधी कार्यक्रमों से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए इन कार्यक्रमों का सटीक डाटा सार्वजनिक नहीं किया जाता.

एक-दूसरे पर अविश्वास की इस स्थिति में कोई बदलाव तभी संभव है, जब संयुक्त राष्ट्र इसमें दखल दे. जाहिर है कि जब तक ऐसा नहीं होता, अपने घर को भीतर से बुहारने वाली और सारा कचरा दरवाजे के बाहर ठेलने वाली मानव सभ्यता के लिए अंतरिक्ष की बिगड़ती सेहत एक समस्या ही बनी रहेगी.

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