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Safala Ekadashi 2019: सफला एकादशी 22 दिसंबर को, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत की कथा

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: December 20, 2019 14:40 IST

Safala Ekadashi 2019: इस बार एकादशी की तिथि 21 दिसंबर को शाम 5.15 बजे से शुरू हो रही है और ये 22 तारीख को दोपहर 3 बजकर 22 मिनट तक होगा। एकादशी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त पूरे दिन का है।

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ठळक मुद्देSafala Ekadashi 2019: सफला एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्वसफला एकादशी करने से व्रती को सभी कार्यों में सफलता मिलती है, इस बार 22 दिसंबर को सफला एकादशी

Safala Ekadashi: हिंदू धर्म में एकादशी का काफी महत्व है। एकादशी का पर्व हर महीने पड़ता है। हर महीने जिस प्रकार प्रदोष में भगवान शिव की पूजा की जाती है, उसी प्रकार एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है। हर महीने पड़ने वाले एकादशी के नाम अलग-अलग होते हैं। मान्यता है कि एकादशी का व्रत करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कार्यों में सफलता मिलती है। इसी में से एक है सफला एकादशी, जिसे करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन के सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

Safala Ekadashi 2019: सफला एकादशी कब है?

पौष माह में पड़ने वाली सफला एकादशी इस बार 22 दिसंबर को पड़ रही है। यह इस साल यानी 2019 की आखिरी एकादशी भी होगी। मान्यता है कि सफला एकादशी करने से व्रती को सभी कार्यों में सफलता मिलती है। इस व्रत को करने से मनुष्य संसार में सभी सुखों को भोगता है और फिर उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार 5 हजार साल तक जिस तप को करने से फल की प्राप्ति होती है, वही फल सफला एकादशी का व्रत करने से साधक को मिलता है।

Safala Ekadashi 2019: सफला एकादशी की पूजा विधि

सफला एकादशी के दिन साधक को तड़के उठना चाहिए और घर सहित मंदिर आदि की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारी करनी चाहिए। स्नानादि के बाद पूजा की तैयारी शुरू करें। भगवान श्री नारायण की लक्ष्मी जी सहित विधिवत पूजा करें। पूजा में फल, गंगाजन, धूप, दीप, नेवैद्य आदि का इस्तेमाल करें। दिन में एक समय फलाहार करना चाहिए। साथ ही रात्रि को भगवान श्री विष्णु के सामने दीप दान करें। इस दिन पूजा के दौरान सफला एकादशी की भी कथा जरूर पढ़ें।

Safala Ekadashi 2019: पूजा का शुभ मुहूर्त

इस बार एकादशी की तिथि 21 दिसंबर को शाम 5.15 बजे से शुरू हो रही है और ये 22 तारीख को दोपहर 3 बजकर 22 मिनट तक होगा। एकादशी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त पूरे दिन का है। हालांकि, सुबह पूजा करना बेहतर होगा। पारण का समय 23 दिसंबर, 2019 को 7 बजकर 10 मिनट से सुबह 9 बजकर 14 मिनट तक होगा।

Safala Ekadashi 2019: सफला एकादशी की कथा

कथा के अनुसार प्राचीन काल में चम्पावती नदर में महिष्मान नाम का एक राजा हुआ करता था। उसके चार बेटे थे। इन सभी मे सबसे बड़े बेटे का नाम लुम्पक था। वह पापी आचरणों से घिरा हुआ था। परस्री, वेश्यागमन और दूसरे कार्य करते हुए वह अपने पिता के धन को नष्ट कर रहा था। साथ ही वह हमेशा ब्राह्मण, वैष्णनों और देवताओं की निंदा करता रहता था।

राजा को जब अपने अपने बड़े पुत्र की इन आदतों के बारे में पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। ऐसे में वह बड़ा बेटा विचार करने लगा कि अब कहां जाए। आखिरकार उसने चोरी करने का फैसला किया। वह दिन में वन में रहता और रात को अपने पिता की नगरी में चोरी करता। 

धीर-धीरे सारी नगरी चोरी की घटनाओं से भयभीत हो गई। कई बार नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते।

उसी जंगल में एक बहुत पुराना और विशाल पीपल का पेड़ था। लोग उसकी भगवान के समान पूजा करते थे। उसी वृक्ष के नीचे लुम्पक रहा करता था। कुछ दिनों बाद पौष महीने की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह वस्त्रहीन होने के कारण ठंड के चलते पूरी रात सो नहीं सका। 

सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया। दूसरे दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी बेहोशी दूर हुई। बेहोशी से जगने पर उसे भूख का अहसास हुआ और वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था इसलिए पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। 

उस समय तक सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- भगवन अब आपको ही अर्पण है ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात भी दुख के कारण लुम्पक को नींद नहीं आई। अनजाने में उसके द्वारा किये गये इस उपवास और जागरण से भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए। 

दूसरे दिन सुबह एक अतिसुंदर घोड़ा कई वस्तुओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे पाप नष्ट हो गए। अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर ले। यह सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके ‘भगवान आपकी जय हो' कहकर अपने पिता के पास गया। उसके पिता ने भी इससे प्रसन्न होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और वन के लिए चल दिए।

कथा के अनुसार इलके बाद लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। उसका सारा कुटुम्ब भगवान नारायण का भक्त हो गया। वृद्ध होने पर वह भी अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में तपस्या करने चला गया और अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ।

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