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Ravidas Jayanti 2022: संत रविदास जयंती कब है? पढ़िए समाज को बदलने वाले उनके ये 7 दोहे

By रुस्तम राणा | Updated: February 13, 2022 14:09 IST

इस बार रविदास जयंती 16 फरवरी 2022, बुधवार को है। महान संतों में शामिल रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास एक गांव में हुआ था। रविदास जी को ही संत रैदास भी कहा जाता है।

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Ravidas Jayanti 2022: संत गुरु रविदास 15वीं सदी के महान समाज सुधारक, दार्शनिक कवि और ईश्वर के अनुयायी थे। उन्होंने दुनिया को भेदभाव से ऊपर उठकर समाज कल्याण की सीख दी। उनके दोहो में भगवान के प्रति प्रेम स्पष्ट झलकता है। हिंदू पंचांग के अनुसार संत रविदास की जयंती हर साल माघ पूर्णिमा को मनाई जाती है। उनकी गिनती भारत के उन महान व्यक्तित्व में होती है जिन्होंने समाज सुधार का अभूतपूर्व कार्य किया। 

महान संतों में शामिल रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास एक गांव में हुआ था। रविदास जी को ही संत रैदास भी कहा जाता है। इस बार रविदास जयंती 16 फरवरी 2022, बुधवार को है। रविदास जी अपने दोहों और कविताओं के माध्यम से समाज में प्रचलित छूआ-छूत, भेदभाव जैसे आडंबरों पर तंज भी कसते थे। उन्होंने कई ऐसे दोहों, कविताओं, कहावतों की रचना की जो आज भी काफी प्रचलित हैं। आईए रविदास जंयती के मौके पर पढ़ते हैं उनके कुछ दोहे...

1. जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात

भावार्थ - अगर केले के तने को छिला जाये पत्ते के नीचे पत्ता ही निकलता है और अंत में पूरा खाली निकलता है।  पेड़ मगर खत्म हो जाता है। वैसे ही इंसान को जातियों में बांट दिया गया है। इंसान खत्म हो जाता है मगर जाति खत्म नहीं होती है। जब तक जाति खत्म नहीं होगीं, तब तक इंसान एक दूसरे से जुड़ नही सकता है, कभी भी एक नहीं हो सकता है।

2. रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन रामसो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम

भावार्थ - जिसके दिल में दिन-रात राम रहते है। उस भक्त को राम समान ही मानना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि न तो उनपर क्रोध का असर होता है और न ही काम की भावना उस पर हावी होती है।

3. मन चंगा तो कठौती में गंगा

भावार्थ - अगर आपका मन और दिल दोनो साफ हैं, तो आपको ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है अर्थात उनके मन अंदर निवास कर सकते हैं।

4. हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आसते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास

भावार्थ - जो मनुष्य ईश्वर की भक्ति छोड़कर दूसरी चीजों को ज्यादा महत्व देता है, उसे अवश्य ही नर्क में जाना पड़ता है। इसलिए इंसान को हमेशा भगवान की भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए और इधर-उधर भटकना नहीं चाहिए।

5. कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखावेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा

भावार्थ - राम, कृष्ण, हरी, ईश्वर, करीम, राघव ये सभी एक ही ईश्वर के अलग-अलग नाम है। वेद, कुरान, पुराण में भी एक ही परमेश्वर का गुणगान है। सभी भगवान की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ सिखाते है।

6. जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड में बासप्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास

भावार्थ- जिस रविदास को देखने से लोगों को घृणा आती थी। उनका निवास नर्क कुंद के समान था। ऐसे रविदास का ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाना सच में फिर से उनकी मनुष्य के रूप में उत्पत्ति हो जाने जैसी है।

7. 'रविदास' जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच

भावार्थ- इंसान कभी जन्म से नीच नहीं होता है। वह अपने बुरे कर्मों से ही नीच बनता है।

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