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जगन्नाथ रथ यात्रा: किस रथ की है क्या खासियत, कितने दिन चलती है यात्रा, जानें 15 अहम बातें

By गुलनीत कौर | Updated: July 14, 2018 09:14 IST

रथ यात्रा के सात दिन बाद जब जगन्नाथ वापिस लौटते हैं तो इस भव्य यात्रा को उनके जन्मभूमि में वापसी की यात्रा माना जाता है। इसे 'बाहुडा' भी कहा जाता है

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हर साल दक्षिण भारत के पुरी समेत देश के कई हिस्सों में जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है। भगवान जगन्नाथ, भगवान कृष्ण का ही एक नाम है। कृष्ण जी को भगवान विष्णु का 8वां मानवरूपी अवतार माना जाता है। पुरी में भगवान जगन्नाथ को समर्पित एक भव्य मंदिर है जिसे 'जगन्नाथ मंदिर' के नाम से जाना जाता है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से यहाँ रथ यात्रा का प्रारम्भ होता है। आज भी बड़े धूमधाम से पुरी और अहमदाबाद में जगन्नाथ की राढ़ यात्रा निकाली जा रही है। इस अवसर पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सभी कृष्ण भक्तों को बधाई दी है। आइए जानते हैं भगवान जगन्नाथ की इस रथ यात्रा से जुड़ी 10 अहम बातें:

1. जगन्नाथ मंदिर हिन्दू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक धाम है। हर साल लाखों लोग मंदिर में दर्शन करने आते हैं। यह हिन्दुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है

2. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में निकाली जाने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा में कुल तीन रथ होते हैं- एक भगवान जगन्नाथ (कृष्ण जी) का, एक जगन्नाथ के भाई बलराम का और तीसरा बहन सुभद्रा का

3. रथ यात्रा में सबसे आगे बलराम का रथ होता है। हर रथ की महत्वता को समझते हुए उसे एक अलग रंग और सजावट दी जाती है। बलराम का रथ 44 फीट ऊंचा होता है और इसे नीले रंग से सजाया जाता है

4. देवी सुभद्रा के रथ की ऊंचाई 43 फीट होती है। इस रथ को विशेषतः काले रंग की वस्तुओं का प्रयोग करके सजाया जाता है। यात्रा में बलराम के रथ के बाद सुभद्रा देवी का रथ होता है

5. इसके बाद आता है भगवान जगन्नाथ का रथ। जिसे यात्रा के दौरान हमेशा आखिर में रखा जाता अहिया। इस रथ की ऊंचाई 45 फीट की होती है और रथ को पीले रंग की सजावट दी जाती है

6. हर रथ में संबंधित देवी-देवता से जुड़ी मूर्ति होती है। लेकिन यह कोई ऐसी-वैसी मूर्ति नहीं होती। दुनिया भर में दिखने वाली मूर्तियों से काफी अलग होती हैं ये मूर्तियां और इन्हें बनाने का तरीका भी अलग होता है

7. भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों को एक खास प्रकार की लकड़ी से बनाया जाता है। देशभर के मंदिरों में देखी जाने वाली मूर्तियों संगमरमर से बनी होती हैं, लेकिन पुरी के जगन्नाथ की मूर्ति एक खास प्रकार की लकड़ी से बनायी जाती है

8. कहते हैं कि भगवान विष्णु के आदेश से ही इन मूर्तियों को लकड़ी के प्रयोग से बनाया गया। उन्होंने ही समुद्र किनारे से मिलने वाली इस लकड़ी का संकेत दिया था

9. भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आरम्भ होने के सात दिन के बाद इसकी वापसी होती है। यात्रा के दौरान तीनों रथों को बड़ी-बड़ी रस्सियों से खींचा जाता है

10. रथ यात्रा के सात दिन बाद जब जगन्नाथ वापिस लौटते हैं तो इस भव्य यात्रा को उनके जन्मभूमि में वापसी की यात्रा माना जाता है। इसे 'बाहुडा' भी कहा जाता है

12. रथ यात्रा के दौरान मंदिर में बड़ी मात्रा में प्रसाद तैयार किया जाता है। इस प्रसाद को तैयार करने के लिए 500 रसोईये और 300 सहयोगी लगाए जाते हैं

ये भी पढ़ें: रथ यात्रा 2018:कोई कहता है चमत्कार तो किसी के लिए है अजूबा, जगरन्नाथ मंदिर की ये हैं 6 हैरान करने वाली बातें

13. वैसे मान्यता है कि ये सभी रसोईये और सहयोगी प्रसाद को केवल एकत्रित कर मंदिर के रसोईघर में रखते हैं और बाहर से दरवाजा बंद कर देते हैं। इसके बाद स्वयं देवी सुभद्रा आकर इस प्रसाद को बनाती हैं। वर्षों से पुरी के जगन्नाथ मंदिर की यह मान्यता चली आ रही है

14. यात्रा के अलावा इस मंदिर के भी कई ऐसे रहस्य हैं जो हैरान कर देने वाले हैं। मंदिर के गुंबद पर लगा ध्वज रहस्यमयी है। यह हमेशा हवा से विपरीत दिशा में लहराता है

15. इसके अलावा मंदिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को आप किसी भी दिशा से देखें, यह आपको देखने पर बिलकुल सामने से ही दिखेगा। मंदिर के ऊपर कभी भी किसी पक्षी को उड़ते हुए नहीं देखा जाता है। इसके अलावा दिन के समय तेज धूप में भी मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया अदृश्य ही रहती है

टॅग्स :जगरन्नाथ पुरी रथ यात्राभगवान कृष्णभगवान विष्णुहिंदू त्योहार
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