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CBI के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा की निगरानी में अजीत डोभाल सहित कईयों के फोन कॉल हुए थे टेप, HC ने मांगा जवाब

By पल्लवी कुमारी | Updated: January 16, 2019 20:08 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति ने 10 जनवरी के मैराथन बैठक के बाद आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया। उन्हें भ्रष्टाचार और कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोपों में पद से हटाया गया।

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीबीआई द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल की कथित अवैध फोन टैपिंग की जांच के लिए एसआईटी के गठन संबंधी याचिका पर केंद्र से मंगलवार को जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया कि सीबीआई जब तत्कालीन निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच विवाद के दौर से गुजर रही थी, उस दौरान कई अन्य लोगों के फोन भी टैप किये गये।

मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन एवं न्यायमूर्ति वी के राव की पीठ ने गृह मंत्रालय और सीबीआई को नोटिस जारी किया और याचिका पर उनके जवाब मांगे। वकील सार्थक चतुर्वेदी द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि सीबीआई के कुछ अधिकारियों ने अपने गुप्त मकसद के लिए मौजूदा दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है।

चतुर्वेदी ने यह भी दावा किया कि केंद्रीय कानून सचिव सुरेश चंद्र और आंध्र प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी रेखा रानी के फोन टैप किए गए और उन्हें निगरानी में भी डाल दिया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा को निगरानी में रखा गया था। याचिका में दावा किया गया है कि विशेष सचिव, रॉ और कानून सचिव के फोन भी निगरानी में रखे गए थे। 

इसमें दावा किया गया कि फोन टैपिंग और तकनीकी निगरानी देखने वाली सीबीआई की विशेष इकाई को एनएसए तथा अस्थाना के बीच हुए संवाद की जानकारी थी। चतुर्वेदी की याचिका में कहा गया है कि फोन की टैपिंग का मुद्दा सीबीआई के डीआईजी मनीष सिन्हा की उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक अर्जी में सामने आया जो अस्थाना के खिलाफ दर्ज एक प्राथमिकी में जांच कर रहे थे।

चतुर्वेदी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने अदालत में दलील दी, ‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के फोन टैप करने की इजाजत किसने दी? ये तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने कैसे आये? यह देश के लिए बहुत खतरनाक है।’’ 

याचिका में दावा किया गया है कि रॉ के विशेष सचिव और विधि सचिव के फोनों पर भी नजर रखी गयी।

CBI चीफ आलोक वर्मा को हटाने के पक्ष में नहीं थे मल्लिकार्जुन खड़गे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति ने 10 जनवरी के मैराथन बैठक के बाद आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया। उन्हें भ्रष्टाचार और कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोपों में पद से हटाया गया। अधिकारियों ने बताया कि वर्मा का दो वर्षों का निर्धारित कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त होने वाला है और वह उसी दिन सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सीबीआई के 55 वर्षों के इतिहास में इस तरह की कार्रवाई का सामना करने वाले जांच एजेंसी के वह पहले प्रमुख हैं। 

समिति में लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के प्रतिनिधि के रूप में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए के सीकरी भी शामिल थे। वर्मा को पद से हटाने का फैसला बहुमत से किया गया। खड़गे ने इस कदम का विरोध किया। 

बैठक तकरीबन दो घंटे तक चली। खड़गे ने सीवीसी द्वारा वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका देने की पुरजोर वकालत की। हालांकि, प्रधानमंत्री और न्यायमूर्ति सीकरी ने इससे सहमति नहीं जताई और एजेंसी से उन्हें बाहर करने का रास्ता साफ कर दिया।

77 दिन बाद ड्यूटी पर लौटते ही CBI चीफ आलोक वर्मा ने लिया था बड़ा फैसला

 जबरन छुट्टी पर भेजे जाने के 77 दिन बाद बुधवार को अपनी ड्यूटी पर लौटे सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने तत्कालीन निदेशक (प्रभारी) एम नागेश्वर द्वारा किये गये लगभग सारे तबादले रद्द कर दिए थे। 

क्यों भेजे गए थे आलोक वर्मा छुट्टी पर और क्या है पूरा CBI VS CBI विवाद

आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच तकरार शुरु होने के बाद मोदी सरकार ने दोनों को छुट्टी पर भेज दिया था और उनके सारे अधिकार ले लिये थे। उसके बाद 1986 बैच के ओड़िशा काडर के आईपीएस अधिकारी नागेश्वर राव को 23 अक्टूबर, 2018 को देर रात को सीबीआई निदेशक के दायित्व और कार्य सौंपे गये थे।

 केन्द्र सरकार ने इसके लिए तर्क दिया था कि ये दोनों अधिकारी अपने ही ऊपर लगे केस की जांच नहीं कर सकते हैं। इसके बाद सीबीआई के नंबर एक अधिकारी के रूप में नागेश्वर राव को  नया अंतरिम निदेशक बनाया था।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 अक्टूबर को सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा की अर्जी पर सुनवाई करने पर सहमत हो गया था। इसकी पहली सुनवाई 26 अक्टूबर को हुई। वर्मा ने खुद को छुट्टी पर भेजे जाने और सारे अधिकार वापस ले लिए जाने के केंद्र के फैसले को चुनौती दी थी। 

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