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जमती डल झील से पर्यटकों में खुशी, बिना बर्फ की सर्दी कश्मीरियों की परेशानी बढ़ा रही है, सेना के सामने भी चुनौती

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: December 14, 2023 16:08 IST

चिल्लेकलां के दौरान डल झील का जमना कोई नई बात नहीं है। पर कश्मीर में अभी चिल्लेकलां (भयानक सर्दी का मौसम) का आगमन नहीं हुआ है पर कश्मीरी अभी से ठंड से चिल्लाने लगे हैं। ऐसे में उन्हें चिंता है कि इस बार चिल्लेकलां के दौरान कितनी भयानक सर्दी पड़ेगी।

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ठळक मुद्देकश्मीर की विश्व प्रसिद्ध डल झील जमने लगी हैकश्मीरियों की परेशानी इस बार बिना बर्फ वाली सर्दी हैकम बर्फबारी के कारण वे दर्रे खुले हुए हैं जहां से आतंकी घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे हैं

जम्मू: कश्मीर की विश्व प्रसिद्ध डल झील जमने लगी है। भयानक सर्दी का आलम यह है कि अन्य पानी के स्रोत्र भी जमने ही लगे हैं। डल झील भी इससे अछूती नहीं है। जैसे जैसे सर्दी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे विश्व प्रसिद्ध डल झील की ऊपरी सतह भी जमती जा रही है। कश्मीर आने वाले पर्यटकों के लिए यह नजारा बेहद ही दिलकश है जिन्होंने पहली बार इस झील को जमते हुए देखा है।

पर कश्मीरियों की परेशानी इस बार बिना बर्फ वाली सर्दी है। उनकी चिंता यह है कि अगर बर्फबारी न हुई तो वे कई परेशानियों से घिर जाएंगें। सेना पहले ही एलओसी पर परेशान है क्योंकि कम बर्फबारी के कारण वे दर्रे खुले हुए हैं जहां से आतंकी घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे हैं। सूखी सर्दीबीमारियों को न्यौता दे रही है। जबकि बर्फबारी न होने की आशंका की स्थिति में गर्मियों में पानी और बिजली की किल्लत का सामना भी करना पड़ सकता है।

चिल्लेकलां के दौरान डल झील का जमना कोई नई बात नहीं है। पर कश्मीर में अभी चिल्लेकलां (भयानक सर्दी का मौसम) का आगमन नहीं हुआ है पर कश्मीरी अभी से ठंड से चिल्लाने लगे हैं। ऐसे में उन्हें चिंता है कि इस बार चिल्लेकलां के दौरान कितनी भयानक सर्दी पड़ेगी। कश्मीर में 21 और 22 दिसम्बर की रात से सर्दी के मौसम की शुरूआत मानी जाती है। करीब 40 दिनों तक के मौसम को चिल्लेकलां कहा जाता है। पिछले करीब तीन सालों से इस दिन हुई बर्फबारी कई सालों के बाद सही समय पर होने पर खुशी जरूर जाहिर की जाती रही है। 

दरअसल कुदरत का समय चक्र सुधरने पर कश्मीरियों की परेशानियां बढ़ गई क्योंकि पिछले कई सालों से बर्फबारी के समय पर न होने के कारण वे चिल्लेकलां को ही भुला बैठे थे।जानकारी के लिए बता दें कि चिल्लेकलां करीब 40 दिनों तक चलता है और उसके बाद चिल्ले खुर्द और फिर चिल्ले बच्चा का मौसम आ जाता है। अभी तक चिल्लेकलां के दौरान 1986 में कश्मीर में तापमान शून्य ये 9 डिग्री नीचे गया था जब विश्व प्रसिद्ध डल झील दूसरी बार जम गई थी। वैसे चिल्लेकलां के दौरान कश्मीर के तापमान में जो गिरावट देखी गई है उसके मुताबिक तापमान शून्य से 5 व 7 डिग्री ही नीचे जाता है। पर इस बार अभी से तापमान शून्य से 5.4 डिग्री नीचे है। यही नहीं श्रीनगर शहर गुलमर्ग से भी ज्यादा ठंडा है।

श्रीनगर स्थित मौसम विभाग ने कहा कि 24 दिसम्बर के बाद ही जबरदस्त हिमपात की संभावना है। अगले 40 दिनों तक न्यूनतम और अधिकतम तापमान, दोनों में गिरावट आएगी। हिमपात और बारिश भी होगी। कुछ वर्षों के दौरान चिल्ले कलां के बजाय चिल्ले खुर्द और चिल्ले बच्चा के दौरान सबसे ज्यादा हिमपात हुआ है। इसे आप जलवायु परिवर्तन का असर भी कह सकते हैं।

ऐसे में कश्मीरियों के लिए बर्फबारी में हरिसा और सूखी-सब्जियां ही सहारा बनती हैं जो अब सारा साल ही कश्मीर में उपलब्ध रहती हैं। चिल्ले कलां में इनकी मांग बढ़ जाती है। पहले यह सर्दियों में मिलती थी। इस समय करेला, टमाटर, शलगम, गोभी, बैंगन समेत कई अन्य सब्जियां और सूखी मछली भी बाजार में आ चुकी हैं। इन्हें स्थानीय लोग गर्मियों में सूखाकर रख लेते हैं ताकि सर्दियों में जब कश्मीर का रास्ता बंद हो जाए तो इनको पकाया जाता है। गोश्त के शौकीनों के लिए हरीसा की दुकानें पूरे कश्मीर में सजने लगी हैं। हरीसा-गोश्त, चावल व मसालों के मिश्रण से तैयार होने वाला विशेष व्यंजन है। हरिसा शरीर को अंदर से गर्म रखने के साथ कैलोरी को भी बनाए रखता है।

टॅग्स :जम्मू कश्मीरJammuभारतीय सेनापर्यटन
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