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#KuchhPositiveKarteHain: भोपाल का 'अपना घर', एक वृद्धाश्रम जहां युवाओं और बच्चों को मिलता है वेद-शास्त्रों का ज्ञान

By सुवासित दत्त | Updated: July 25, 2018 08:07 IST

लोकमत न्यूज आजादी के 71 साल का जश्न ऐसी 71 शख्सियतों के साथ मना रहा है, जिन्होंने समाज में कुछ पॉजिटिव किया है, बिना किसी का इंतजार किए।

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इनपुट: शिव अनुराग पटेरिया/ सुमित वर्मा

भोपाल: बीते कुछ दिनों पहले एक रिपोर्ट पढ़ी थी जिसके मुताबिक देशभर में वृद्धाश्रम यानि ओल्ड एज होम में जबरदस्त वृद्धि हुई है। आलम ये है कि ऐसे वृद्धाश्रम में कई अच्छे घरों के बुजुर्ग भी रहने पर मजबूर हो रहे हैं। शायद हमारी पारिवारिक और सामाजिक संवेदनहीनता ही इस के लिए सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार है। ऐसे ही कुछ वृद्धाश्रम के बारे में जानकारी जुटाते जुटाते मेरी नज़र भोपाल के एक वृद्धाश्रम पर पड़ी। इसे 'अपना घर' के नाम से जाना जाता है। इस वृद्धाश्रम में कुल 25 बुजुर्ग रहते हैं।

लेकिन, इसकी खासियत सिर्फ इतनी नहीं है। इसकी और भी खासियतों को जानने के लिए मैंने अपने वरिष्ठ सहयोगी शिव अनुराग पटेरिया जी को इस वृद्धाश्रम के बारे में बताया। पटेरिया जी ने अपने सहयोगी सुमित वर्मा के साथ इस वृद्धाश्रम के बारे में ज्यादा जानकारी जुटाने में मेरी मदद की।

भोपाल के कोलार स्थित रोड स्थित ये वृद्धाश्रम बाकी वृद्धाश्रमों से थोड़ा अलग है। हर गुरुवार इस वृद्धाश्रम में कई युवा छात्र-छात्राओं की भीड़ लगती है। ये वो छात्र होते हैं जो मेडिकल, इंजीनियरिंग या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे होते हैं। हम पूरा माजरा समझने के लिए इस वृद्धाश्रम पहुंचे। यहां पहुंचने पर पता चला कि हर गुरुवार यहां रहने वाले बुजुर्ग दो घंटे इन छात्रों की क्लास लेते हैं। इस क्लास में वे इन युवाओं को वेद और शास्त्र पढ़ाते हैं। इस दौरान हर उम्र के छात्र इन बुजुर्गों से वेद-पुराणों के बारे में जानते हैं और उसे समझने की कोशिश करते हैं।

आश्रम में रहने वाले कुछ बुजुर्ग वेदों और पुराणों के अच्छे जानकार हैं और वो ये ज्ञान अपनी नई पीढ़ी को भी देना चाहते हैं। ताज्जुब की बात ये है कि पंजाबी रैप की दीवानगी और हर वीकेंड पब में बीताने वाली आज की युवा पीढ़ी में कुछ युवा ऐसे भी हैं जो वेद और पुराणों के बारे में भी जानना चाहते हैं। भोपाल के 'अपना घर' में वेद की शिक्षा लेने आने वाले कुछ युवाओं से जब हमने बात की तो उनका कहना था कि वेदों का क्लास लेना अद्भुत है, इससे मानसिक शांति तो मिलती ही है साथ ही साथ इन बुजुर्गों की जिंदगी के अनुभवों के जानकर काफी कुछ सीखने को भी मिल जाता है।

आश्रम में रहने वाले बुजुर्ग सदाशिव माहुरकर इस बारे बात करते  हुए भावुक हो जाते हैं। माहुरकर कहते हैं, 'मेरे बेटे-बेटियां बहुत समृद्ध हैं। उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं। सब अपने-अपने परिवार के साथ खुश हैं। लेकिन, मैं यहां वृद्धाश्रम में पड़ा हुआ हूं। जिन बच्चों को मैंने पाल-पोस कर बड़ा किया उनके लिए ही अब मैं पराया हो गया हूं। ये सोचकर मेरा मन हमेशा दुखी रहता है। लेकिन, जब मैं आश्रम में वेद-पुराण के बारे में जानने वाले इन युवाओं को देखता हूं तो बहुत अच्छा लगता है। उम्र के इस पड़ाव में जब बच्चे हमारे पास आकर कुछ सीखना चाहते हैं, हमारे साथ वक्त बिताना चाहते हैं तो मुझे ऐसा लगता है जैसा मेरा परिवार मुझे मिल गया हो। हम सब मिलकर इन बच्चों को वेदों और पुराणों की जानकारी देते हैं।'

'अपना घर' में कुल 25 बुजुर्ग रहते हैं। इनमें कोई पूर्व जज, पूर्व इंजीनियर है तो कोई थिएटर आर्टिस्ट है। लेकिन, उम्र के इस पड़ाव में इनके परिवार ने ही इनका साथ छोड़ दिया है। इस आश्रम की संस्थापक माधुरी मिश्र हैं। माधुरी बताती हैं कि आश्रम में एक लाइब्रेरी भी बनाई गई है जिसमें हर धर्म के ग्रंथ और किताबें रखी गई हैं। आश्रम में आने वाले युवा इस लाइब्रेरी का भी पूरा फायदा उठाते हैं। आश्रम में आने वाले युवाओं में कुछ ऐसे भी होते हैं जो मानसिक अवसाद में होते हैं। उन्हें भी यहां के बुजुर्ग वेदों के आधार पर उन्हें समझा कर जिंदगी जीने के तरीके बताते हैं।

बकौल माधुरी मिश्र, 25 बुजुर्गों की देखभाल एक कठिन काम है लेकिन, लोगों के सहयोग से ये काम अच्छे से हो रहा है। इस आश्रम को सरकार से किसी भी तरह की मदद या अनुदान नहीं मिला है। ये आश्रम एक किराए के घर में चलता है। इसका खर्च माधुरी मिश्र और उनका परिवार ही उठाता है।

उम्र के इस पड़ाव में अपने ही परिवार से दूर रहने वाले इन बुजुर्गों ने अपना एक नया परिवार बना लिया है। अपने बेटे-बेटियों को तो वेद और पुराण की सीख भले ही ना सीखा पाए हों लेकिन, आश्रम में आने वाले बच्चों की जिंदगी अंधकार में ना रहे और कम से कम वे बच्चे अपने बुजुर्गों की सेवा करें, यही इनका प्रयास है। इस उम्र में भी अपनों के द्वारा दिए गए ज़ख्म को भुला कर नई पीढ़ी को ऐसी शिक्षा देना वाकई काबिल-ए-तारीफ है। आज़ाद देश की नई पीढ़ी को ये बुजुर्ग एक नई रोशनी दे रहे हैं जिन्हें पीढियां याद रखेंगी। 

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