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भ्रष्टाचार का मामलाः इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन शुक्ला पर चलेगा मुकदमा, निजी मेडिकल कॉलेज को फायदा पहुंचाने का आरोप

By भाषा | Updated: November 26, 2021 19:46 IST

सीबीआई ने भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के तहत इस साल 16 अप्रैल को सेवानिवृत्त न्यायाधीश पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी मांगी थी।

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ठळक मुद्देसीबीआई अब सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर सकती है।न्यायाधीश शुक्ला पांच अक्टूबर 2005 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हिस्सा बने और 17 जुलाई 2020 को सेवानिवृत्त हुए। न्यायमूर्ति शुक्ला के खिलाफ शिकायत में निहित आरोपों में पर्याप्त सामग्री है।

नई दिल्लीः केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को भ्रष्टाचार के एक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस एन शुक्ला पर मुकदमा चलाने की मंजूरी मिल गयी है। उन पर अपने आदेशों के जरिये एक निजी मेडिकल कॉलेज को फायदा पहुंचाने का आरोप है।

अधिकारियों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सीबीआई ने भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के तहत इस साल 16 अप्रैल को सेवानिवृत्त न्यायाधीश पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी मांगी थी। केंद्र सरकार के मंजूरी देने के बाद सीबीआई अब सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर सकती है।

अधिकारियों ने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायाधीश शुक्ला के अलावा एजेंसी ने प्राथमिकी में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आई एम कुद्दुसी, प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के भगवान प्रसाद यादव तथा पलाश यादव, ट्रस्ट और निजी व्यक्तियों भावना पांडेय और सुधीर गिरि को भी नामजद किया है।

उच्च न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार, सीबीआई को सेवानिवृत्त न्यायाधीश कुद्दुसी पर मुकदमा चलाने की मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कथित अपराध होने के वक्त वह सेवानिवृत्त हो गए थे और वह एक निजी व्यक्ति की हैसियत से इसमें कथित तौर पर शामिल हुए।

न्यायाधीश शुक्ला पांच अक्टूबर 2005 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हिस्सा बने और 17 जुलाई 2020 को सेवानिवृत्त हुए। न्यायमूर्ति शुक्ला, जो उच्च न्यायालय में एक खंडपीठ का नेतृत्व कर रहे थे, ने 2017-18 के शैक्षणिक सत्र के लिए निजी कॉलेजों को छात्रों को प्रवेश देने की अनुमति देने के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के नेतृत्व वाली शीर्ष अदालत की पीठ द्वारा पारित स्पष्ट आदेशों की कथित तौर पर अवहेलना की थी।

उस समय तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा ने संज्ञान लिया था और आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय आंतरिक समिति का गठन किया था। मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी, सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.के. अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.के जायसवाल की समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि न्यायमूर्ति शुक्ला के खिलाफ शिकायत में निहित आरोपों में पर्याप्त सामग्री है।

रिपोर्ट मिलने के बाद, 2018 में न्यायमूर्ति मिश्रा ने न्यायमूर्ति शुक्ला को इस्तीफा देने या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया। न्यायमूर्ति शुक्ला ने 23 मार्च, 2019 को तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई को पत्र लिखकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपना न्यायिक कार्य शुरू करने की अनुमति मांगी। तब न्यायमूर्ति गोगोई ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति शुक्ला को हटाने का अनुरोध किया था।

सीजेआई ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखे थे और इसके बाद राज्यसभा के सभापति ने आरोपों की जांच के लिए न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के प्रावधानों के तहत सीजेआई के परामर्श से तीन-न्यायाधीशों की जांच समिति की नियुक्त की थी। हालांकि, प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी (आपराधिक षडयंत्र) और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है।

प्राथमिकी दर्ज करने के बाद सीबीआई ने लखनऊ, मेरठ और दिल्ली में कई स्थानों पर छापे मारे थे। उन्होंने बताया कि ऐसा आरोप है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को केंद्र ने खराब सुविधाओं और आवश्यक मानदंड पूरा न करने के कारण छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया था। उसके साथ 46 अन्य मेडिकल कॉलेजों को भी मई 2017 में इसी आधार पर छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया गया था।

अधिकारियों ने बताया कि ट्रस्ट ने उच्चतम न्यायालय में एक रिट याचिका के जरिए इस रोक को चुनौती दी थी। इसके बाद प्राथमिकी में नामजद लोगों ने एक साजिश रची और न्यायालय की अनुमति से याचिका वापस ले ली गयी। 24 अगस्त 2017 को उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के समक्ष एक अन्य रिट याचिका दायर की गयी। उन्होंने बताया कि प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि न्यायाधीश शुक्ला समेत एक खंडपीठ ने 25 अगस्त 2017 को याचिका पर सुनवाई की और उसी दिन एक अनुकूल आदेश पारित किया गया था। 

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