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भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में देरी की एक वजह महाराष्ट्र के गठबंधन की मुश्किल भी

By संतोष ठाकुर | Updated: June 14, 2019 05:25 IST

भाजपा के नए अध्यक्ष की तलाश के बीच पार्टी के अंदर एक विचार यह भी है कि इस साल के अंत तक अमित शाह ही पार्टी अध्यक्ष बने रहें।

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भाजपा के नए अध्यक्ष की तलाश के बीच पार्टी के अंदर एक विचार यह भी है कि इस साल के अंत तक अमित शाह ही पार्टी अध्यक्ष बने रहें। इसकी सबसे बड़ी वजहों में महाराष्ट्र के गठबंधन की मुश्किल को भी माना जा रहा है। हरियाणा और झारखंड की तरह ही यहां पर इस साल के अंत में चुनाव होने हैं। ऐसे में पार्टी के आला नेताओं का मानना है कि अमित शाह ही ऐसे अध्यक्ष हो सकते हैं जो शिवसेना केे साथ सीटों के बंटवारे और अपनी पसंद की सीटों पर कोई निर्णायक समझौता कर सकते हैं। शिवसेना एक मुश्किल साथी है, जिससे वार्ता के लिए अमित शाह जैसे रणनीतिकार की ही जरूरत है। शिवसेना के साथ भाजपा का राज्य में आधी—आधी सीटों पर चुनाव लड़ने का सैद्धांतिक समझौता है। लोकसभा चुनाव के पहले ही दोनों ने बिहार मॉडल को आधार मानकर इसको लेकर अपनी सहमति दी थी। लेकिन जब सरकार का गठन हुआ तो एक बार फिर शिवसेना ने केवल एक मंत्रालय देने पर अपनी नाराजगी जाहिर की। यही नहीं, शिवसेना की ओर से लगातार भाजपा सरकार पर तंज भी कसे जाते हैं। हालांकि दूसरी ओर वह सरकार में शामिल है। उसके कोटे से मंत्री बनाए गए अरविंद सावंत ने मंत्री पदभार भी संभाल लिया है।  एक वरिष्ठ भाजपा पदाधिकारी ने कहा कि उद्वव ठाकरे और शिवसेना के साथ भले ही राज्य में आधी—आधी सीट का वादा है लेकिन इन पचास प्रतिशत सीटों में से भाजपा कहां से लड़ेगी, यह निर्णय करना काफी महत्वपूर्ण है। वहीं, जिस तरह का माहौल शिवसेना की ओर से उत्पन्न किया जाता है, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि उनके साथ सीटों का तालमेल—मोलभाव करते समय कोई सख्त और रणनीति—कुशल व्यक्ति अध्यक्ष हो। यह असाध्य कार्य केवल अमित शाह ही कर सकते हैं। यही वजह है कि पार्टी चाहती है कि वह महाराष्ट्र चुनाव तक अध्यक्ष बने रहें। अन्य दो राज्यों झारखंड—हरियाणा में इस तरह की समस्या नहीं है। हालांकि महाराष्ट्र की तरह ही इन दो राज्यों में भी चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है। यह असाध्य कार्य केवल अमित शाह ही कर सकते हैं। जिसकी वजह से पार्टी उनके ही नेतृत्व में यहां पर चुनाव चाहती है। क्या यह समस्या आगे नहीं आएगी जब अमित शाह पार्टी अध्यक्ष नहीं रहेंगे। इस पदाधिकारी ने कहा कि इसके उपरांत जहां भी चुनाव होने हैं वहां पर हमारा कोई भी सहयोगी दल शिव सेना की तरह नहीं है। बिहार में जदयू मुख्य दल है और वहां पर पार्टी को किसी तरह के टकराव की स्थिति से दो—चार नहीं होना होता है। जबकि अन्य जगहों पर भाजपा अपने दम पर ही चुनाव लड़ती है और अगर कहीं उसके सहयोगी हैं तो वह भाजपा से तकरार नहीं करते हैं। ऐसे में अन्य जगहों की तुलना में महाराष्ट्र में स्थिति सबसे अलग है। यही वजह है कि वहां पर चुनाव में पार्टी अमित शाह के नेतृत्व में उतरना चाहती है।  

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