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50 सालों से जल रही अमर जवान ज्योति अब राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में होगी समाहित, 25,942 शहीदों के नाम दर्ज हैं यहां

By आजाद खान | Updated: January 21, 2022 10:02 IST

इस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फरवरी 2019 को उद्घाटन किया था।

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ठळक मुद्देआज अमर जवान ज्योति को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के साथ विलय किया जाएगा। करीब पिछले 50 सालों से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट पर यह ज्योति जल रही थी।इस युद्ध स्मारक पर 25,942 सैनिकों के नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किए गए हैं।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में इंडिया गेट पर पिछले 50 साल से जल रही अमर जवान ज्योति (Amar Jawan Jyoti) का शुक्रवार को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जल रही लौ में विलय किया जाएगा। सेना के अधिकारियों ने गुरूवार को यह जानकारी दी है। बता दें कि अमर जवान ज्योति की स्थापना उन भारतीय सैनिकों की याद में की गई थी जोकि 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए थे। इस युद्ध में भारत की विजय हुई थी और बांग्लादेश का गठन हुआ था। इसके बाद उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 26 जनवरी 1972 को इसका उद्घाटन किया था। तब से लेकर आजतक यह ज्योति जलते आ रही है। 

कैसे होगा यह विलय

सेना के अधिकारियों के मुताबिक, शुक्रवार दोपहर में होने वाले इस समारोह में जलती हुई अग्नि के कुछ हिस्से को इंडिया गेट से राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में जल रही ज्वाला तक ले जाया जाएगा। फिर इसके बाद इंडिया गेट पर ज्वाला को बुझा दिया जाएगा। इस प्रकार यह विलय पूरा होगा। गौरतलब है कि यह राष्ट्रीय युद्ध स्मारक इंडिया गेट के पास मौजूद है और यह करीब 40 एकड़ से भी ज्यादा इलाके में हुआ है। यहां पर 26 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिकों के नाम दर्ज हैं जो देश की सेवा में शहीद हो गए हैं। 

पीएम मोदी हर साल युद्ध स्मारक पर करते हैं पुष्पांजलि

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने 25 फरवरी 2019 को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का उद्घाटन किया था, जहां 25,942 सैनिकों के नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखे गए हैं। परंपरा के अनुसार, गणतंत्र दिवस से पहले सैन्य अधिकारियों के साथ पीएम मोदी इस युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि करते हैं। फिर आगे का प्रोग्राम भी होता है।

इस युद्ध स्मारक में संगमरमर पर राइफल और सैनिक का हैलमेट लगा हुआ है। बताया जाता है कि अलग-अलग युद्धों में देश के लिए जान गंवाने वाले जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए कोई युद्ध स्मारक नहीं था, इसलिए इसे बनाया गया था। 

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