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कर्नाटक: मैसूर पैलेस जहां जूते-चप्पल पहन कर जाने की नहीं है इजाजत, जानिए इस भव्य महल के बारे में

By अनुभा जैन | Updated: March 21, 2023 14:42 IST

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मैसूर: शाही महल और किले भारतीय संस्कृति की विरासत हैं। ये भारतीय शाही परिवारों के असाधारण जीवन शैली और उनके शानदार बीते युग का प्रदर्शन करते हैं। ताजमहल के बाद भारत के सबसे रमणीय पर्यटन स्थलों में से एक कर्नाटक के मैसूर का भव्य मैसूर पैलेस है। कोविड महामारी से पहले मैसूर पैलेस और शहर में सालाना लगभग 40 लाख आगंतुक आया करते थे। हिंदू देवी दुर्गा को समर्पित इस महल को अंबा विलास पैलेस के नाम से भी जाना जाता है।

सम्राट कृष्ण राजा वाडियार ने इस आलीशान महल को बनाने में 42 लाख रुपये खर्च किए। मैसूर महल वाडियार राजवंश और मैसूर राज्य की गद्दी है। महल की वास्तुकला और निर्मित गुंबद मुगल-हिंदू, गोथिक यूरोपीय निर्माण शैली की झ

लक देते हैं। इस महल के बाहरी हिस्से में कई मेहराब, छतरियां, मंदिर, स्तंभ और खिड़कियां हैं। महल के चारों ओर हरा-भरा बगीचा भी है।

महल के अंदर जूते पहनने की अनुमति नहीं

महल की अपनी यात्रा के दौरान, मैंने जो दिलचस्प बात देखी, वह यह थी कि मैसूर महल के परिसर के अंदर पर्यटकों को जूते पहनने की अनुमति नहीं है क्योंकि महल के अंदर विभिन्न हिंदू देवताओं को समर्पित 14 मंदिरों का निर्माण किया गया है। मैं यह देखकर चकित रह गयी कि महल में उस युग के सम्राट द्वारा 1912 में बनवाई गई एक लिफ्ट भी थी जो चालू नहीं थी जिसे आज तक महल में उसी तरह से रखा गया है।

महल में दो हॉल देखे जा सकते हैं, यानी जनता के लिए दीवान-ए-आम और सम्राट द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला दीवान-ए-ख़ास, महल के सबसे शानदार हॉल में से एक है। दीवान-ए-ख़ास में दीवारों को भित्तिचित्रों से सजाया गया है और चमकीले स्तंभों और फर्श को फ़िरोज़ा नीले, मैरून और पीले-सुनहरे रंगों में सजावटी रंगीन कांच और लकड़ी की नक्काशीदार छत के साथ सुशोभित कर कई झूमर लटकाए गए हैं। 

इस भव्य हॉल में प्रवेश हाथीदांत से बने हुए एक सुंदर नक्काशीदार चंदन के दरवाजे के माध्यम से होता है। हॉल से बाहर निकलते हुये कुछ सीड़ियां उतरकर भगवान गणेश का मंदिर है जिसके चांदी की नक्काशी वाले बेहद खूबसूरत दोहरे दरवाजें हैं। दीवान-ए-ख़ास  के सभागार में सम्राट अपने मंत्रिपरिषद के साथ राज्य के विकास के महत्वपूर्ण निर्णय लिया करते थे। महल के मध्य भाग में एक बड़ा हॉल है जिसमें विशाल मेहराब के आकार के अलंकृत सात से आठ विशाल खिड़कियाँ हैं जहाँ से शहर के एक विशाल हिस्से को देखा जा सकता है।

महल में दीवारों को लगभग 26 हस्तनिर्मित चित्रों की एक पंक्ति से सजाया गया है। 1934 से 1945 के दौरान चित्रित इन पेंटिग्स की विशेषता यह है कि इन्हें सिल्क के कपड़े पर चित्रित किया गया है और फिर लकड़ी की चादर के फ्रेम में उकेरा गया है।

जैसे ही मैंने परिसर में प्रवेश किया, प्रवेश द्वार पर असली हाथी की खाल के दो बेहद विशाल हाथी के चेहरे लटकाये गये हैं। हिंदू देवता भगवान नरसिम्हा का दो सिर वाला गिद्ध या गरुड़ का अवतार वाडियार साम्राज्य की आधिकारिक मुहर है जिसे महल के संग्रहालय में प्रदर्शित कई वस्तुओं में भी देखा जा सकता है।

श्री यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार मैसूर के रॉयल हाउस के 27वें और वर्तमान संरक्षक हैं। इन महलों में उपयोग की जाने वाली शिल्प कौशल के कारण, ऐसे पुराने लेकिन भव्य महलों को अधिक सहजता के साथ संरक्षित करने की आवश्यकता है। आज के समय में कुछ महलों को संग्रहालयों या फिर हेरिटेज होटलों में तब्दील कर दिया गया है।

इसी कड़ी में कई कमरों वाले इस आलीशान मैसूर पैलेस के एक हिस्से में वर्तमान महाराजा और उनका परिवार रह रहे हैं। और महल के एक अन्य हिस्से में जिसमें कई कमरे हैं जैसे पोर्ट्रेट गैलरी, शाही शस्त्रागार, वेशभूषा का संग्रह, और एक आभूषण कक्ष जिसमें 100 साल पुरानी चांदी की कुर्सियों के साथ, एक ड्रेसिंग टेबल, विभिन्न आकारों के लकड़ी के नक्काशीदार बक्से, इटली का चांदी कटग्लास और हाथी दांत से बना एक दर्पण जैसे कई अनोखी महाराज की वस्तुओं को आम जनता के लिए एक संग्रहालय बनाकर रखा गया है।

 

सम्राट के 85 वर्षीय हाथी की मृत्यु होने पर उसे सम्राट के संग्रहालय में ही प्रदर्शित किया गया है। बेल्जियम शैली में, महल में लगाये गए सुंदर दुर्लभ चित्रों को आम जनता द्वारा खराब कर दिये जाने से कई हॉल और कमरों में प्रवेश आम जनता के लिये प्रतिबंधित है।

यह उल्लेख करना उचित है कि दशहरा दक्षिण भारत में विशेष रूप से मैसूर शहर में सबसे भव्य रूप में मनाया जाने वाला त्यौंहार है। दशहरे के उन 10 दिनों में पूरा मैसूर शहर नई दुल्हन की तरह सज जाता है। इस समय महाराज के निजी दरबार के लिए 280 किलो वजन और 800 साल से अधिक पुराना, स्वर्ण सिंहासन मैसूर पैलेस के मजबूत कमरे से बाहर निकला जाता है। दरबार के दौरान, श्री यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार पारंपरिक आभूषण और शाही कपड़े पहन, दरबार हॉल में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान होते हैं, और दशहरे के दौरान सभी नौ दिनों में एक निजी दरबार लगाते हैं। 

इसके अलावा, मैसूर पैलेस में महल के पुजारियों द्वारा गणपति होम, चामुंडेश्वरी पूजा, नवग्रह होम और शांति पूजा सहित प्रार्थनाओं की एक श्रृंखला की जाती है। उत्सव समाप्त होते ही स्वर्ण सिंहासन फिर से विघटित कर मैसूर पैलेस के स्ट्रांग रूम रख दिया जाता है। इसी तरह 750 किग्रा. हावड़ा (ऊंट/हाथी की पिछली सीट) को हाथी की पीठ पर बिठाकर दशहरे के समय मैसूर की सड़कों पर घुमाया जाता है। कुल मिलाकर, मैसूर पैलेस दक्षिण भारत की यात्रा करने वाले लोगों के लिए और विशेष रूप से दशहरे के त्योहार के समय एक रमणीय पर्यटक स्थल है।

(सभी फोटो- अनुभा जैन)

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